पितृपक्ष 2026: उत्तर प्रदेश के 5 प्रमुख पिंडदान तीर्थ — प्रयागराज से काशी तक, जानिए महत्व
सारांश
मुख्य बातें
पितृपक्ष 26 सितंबर 2026 से आरंभ हो रहा है और इस दौरान पितरों की शांति एवं मुक्ति के लिए पिंडदान सर्वाधिक पुण्यकारी अनुष्ठान माना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र कार्य के लिए केवल बिहार का गया ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में भी अनेक तीर्थ स्थल हैं — प्रयागराज के त्रिवेणी संगम से लेकर काशी के मणिकर्णिका घाट, मथुरा के ध्रुव घाट और अयोध्या के सरयू तट तक — जहाँ पिंडदान से पूर्वजों को मोक्ष मिलने की परंपरागत आस्था है।
प्रयागराज: पितृमुक्ति का प्रथम द्वार
प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर पिंडदान को सनातन परंपरा में पितरों की मुक्ति का 'प्रथम और मुख्य द्वार' कहा गया है। मान्यता है कि यहाँ तर्पण करने से पितर तृप्त होते हैं और उन्हें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म की परिपाटी के अनुसार, पितृ श्राद्ध कर्म की शुरुआत प्रयाग के मुंडन संस्कार से होती है — यहाँ मुंडन कर बालों का दान करने के पश्चात 17 पिंड तैयार कर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है और फिर विधि-विधान से उन्हें संगम में विसर्जित किया जाता है। मान्यता यह भी है कि संगम पर पिंडदान से भगवान विष्णु के साथ तीर्थराज प्रयाग में वास करने वाले 33 करोड़ देवी-देवता भी पितरों को मोक्ष प्रदान करते हैं।
काशी: महाश्मशान पर श्राद्ध और पिशाच मोचन
भगवान शिव की नगरी काशी (वाराणसी) में गंगा घाट पर श्राद्ध और तर्पण अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। मणिकर्णिका घाट — जिसे 'महाश्मशान' भी कहा जाता है — पर सामान्य पिंडदान, तर्पण और मोक्ष-कामना से जुड़े सभी कार्य किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, पिशाच मोचन कुंड पर कर्मकांड करने से अकाल मृत्यु, दुर्घटना या असाधारण परिस्थितियों में दिवंगत परिजनों की आत्मा को कष्टों से मुक्ति मिलने की आस्था है। त्रिपिंडी श्राद्ध और प्रेत योनि से मुक्ति के लिए यह कुंड विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
मथुरा: यमुना तट पर तर्पण की परंपरा
भव्य मंदिरों से सुशोभित मथुरा को भारत और उसके बाहर एक पवित्र तीर्थ नगरी का दर्जा प्राप्त है। यहाँ यमुना नदी के तट पर स्थित बोधिनी तीर्थ, विश्रंती तीर्थ और वायु तीर्थ पर पिंडदान के अनुष्ठान किए जाते हैं। मथुरा के 24 प्रमुख घाटों में से एक ध्रुव घाट को पितृ तर्पण के लिए प्रधान माना जाता है; इसके समीप ध्रुव टीले पर एक छोटे मंदिर में ध्रुव जी का विग्रह स्थापित है। परंपरा के अनुसार, यहाँ सात पिंड — चावल अथवा गेहूँ के आटे से बने गोले — शहद और दूध के साथ तैयार कर मंत्रोच्चार के बीच पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए चढ़ाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, राधाकुंड स्थित 'गया घाट' पर भी पिंडदान की प्रथा है, जहाँ राधाकुंड के 19 घाटों में से एक पर ब्रजवासी और देशभर के श्रद्धालु पितरों की मुक्ति के लिए आते हैं।
अयोध्या: भरत कुंड — गया तीर्थ के समतुल्य
भगवान राम की नगरी अयोध्या में पितरों का पिंडदान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। पवित्र सरयू नदी के तट पर स्थित भरत कुंड वह ऐतिहासिक स्थल है जो वनवास से लौटे भगवान राम और भरत के मिलन का साक्षी रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम ने वनवास से वापसी के बाद अपने पिता राजा दशरथ का तर्पण इसी स्थान पर किया था, तभी से यहाँ पिंडदान की परंपरा चली आ रही है। यह भी मान्यता है कि भगवान विष्णु के दाहिने पाँव का चरण चिह्न यहाँ की गयावेदी पर अंकित है। भरत कुंड में किया गया पिंडदान गया तीर्थ के समान फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु पहले सरयू में स्नान करते हैं, फिर हिंदू ब्राह्मण पुजारी की अध्यक्षता में अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं, हवन करवाते हैं और अंत में गरीबों को भिक्षा देकर घर लौटते हैं।
नैमिषारण्य: स्कंद पुराण का तीसरा प्रधान तीर्थ
स्कंद पुराण में पितृ-कार्यों के लिए तीन तीर्थ प्रधान बताए गए हैं — बद्रीनाथ, गया (बिहार) और उत्तर प्रदेश का नैमिषारण्य। नैमिषारण्य को पितरों की तृप्ति के लिए विशेष महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति यहाँ अपने पितरों के नाम से पिंडदान करता है, उसके पितर बैकुंठधाम को प्राप्त होते हैं। यह तीर्थ उत्तर प्रदेश में पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख गंतव्य बना रहता है। गौरतलब है कि नैमिषारण्य का उल्लेख अनेक पुराणों में ऋषि-मुनियों की तपःस्थली के रूप में भी मिलता है, जो इसकी धार्मिक महत्ता को और गहरा करता है।