क्या जर्मनी ने बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं?
सारांश
Key Takeaways
- जर्मनी ने भारत के साथ संबंधों को मजबूत किया है।
- द्विपक्षीय व्यापार 2025 में 50 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक रहा।
- भारत जर्मनी का पसंदीदा साझेदार बनता जा रहा है।
- रक्षा सहयोग के क्षेत्र में नई पहलें हो रही हैं।
- यूरोपीय संघ-भारत मुक्त व्यापार समझौता संभावित लाभों को बढ़ा सकता है।
नई दिल्ली, 20 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में तेजी से हो रहे परिवर्तनों और आपूर्ति शृंखलाओं की कमजोरियों के चलते जर्मनी ने भारत के साथ अपने संबंधों को और अधिक मजबूत किया है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज भारत को जर्मनी का “पसंदीदा साझेदार” मानते हैं, जिससे वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विविध अवसर मिलते हैं।
‘वन वर्ल्ड आउटलुक’ में मिरियम बाउमन के एक लेख के अनुसार, यूरोप की आर्थिक महाशक्ति जर्मनी के लिए भारत के साथ यह साझेदारी कई महत्वपूर्ण लाभ लाती है- बेहतर बाजार पहुंच, चीन पर निर्भरता में कमी, रक्षा निर्यात को बढ़ावा, और नवाचार पर आधारित विकास।
इस लेख में यह भी बताया गया है कि 2024 में जर्मन सरकार द्वारा लागू की गई “फोकस ऑन इंडिया” रणनीति के तहत भारत को 2027 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर रखा गया है। भारत का तेज़ी से बढ़ता मध्यम वर्ग और डिजिटल क्षमताएं इस साझेदारी को और भी आकर्षक बनाती हैं। 2025 में द्विपक्षीय व्यापार 35 अरब यूरो से अधिक होने का अनुमान है, जो साल-दर-साल 15 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। मार्च 2025 तक भारत में जर्मनी का कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 15.11 अरब अमेरिकी डॉलर पहुंच चुका है। भारत में 2,000 से अधिक जर्मन कंपनियां कार्यरत हैं, जो लगभग चार लाख लोगों को रोजगार दे रही हैं और ऑटोमोबाइल, रसायन, और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रही हैं।
इस लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि प्रस्तावित यूरोपीय संघ–भारत मुक्त व्यापार समझौता इन लाभों को और बढ़ा सकता है। इससे भारत में यूरोपीय संघ के उत्पादों पर औसतन 12 प्रतिशत शुल्क में कटौती होगी और लगभग 20 अरब यूरो के अतिरिक्त व्यापार के अवसर खुल सकते हैं।
हाल ही में चांसलर मर्ज की भारत यात्रा के दौरान रक्षा, प्रौद्योगिकी, महत्वपूर्ण खनिजों और हरित ऊर्जा से संबंधित 19 समझौता ज्ञापनों और संयुक्त आशय घोषणाओं पर हस्ताक्षर किए गए।
रक्षा सहयोग के क्षेत्र में दोनों देशों के रिश्ते अब परामर्श स्तर से आगे बढ़कर मजबूत औद्योगिक साझेदारी में बदल चुके हैं। मर्ज की यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित द्विपक्षीय रक्षा औद्योगिक सहयोग को मज़बूत करने संबंधी संयुक्त घोषणा से सह-विकास, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और उन्नत प्लेटफॉर्म के सह-उत्पादन का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
जर्मन कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स को भारत की ‘प्रोजेक्ट 75आई’ योजना से महत्वपूर्ण लाभ मिलने की संभावना है। यह लगभग 5 अरब यूरो की परियोजना है, जिसमें मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के साथ छह एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन तकनीक से लैस पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा।
लेख के अनुसार, इस सौदे से जर्मनी को उच्च मूल्य वाले रक्षा निर्यात के माध्यम से रोजगार सृजन का अवसर मिलेगा और भारत की नौसैनिक आधुनिकीकरण प्रक्रिया में जर्मनी एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में उभरेगा। इसके साथ ही, पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भारत की रूस पर निर्भरता भी कम होगी।
रणनीतिक दृष्टि से यह साझेदारी जर्मनी की हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उपस्थिति को मजबूत करती है, जो उसकी 2020 की क्षेत्रीय दिशानिर्देशों के अनुरूप है। चीन की आक्रामकता के बीच समुद्री क्षेत्र की जागरूकता और लॉजिस्टिक सहयोग से नियम-आधारित व्यवस्था को बल मिलता है, जिससे जर्मनी के व्यापार मार्ग सुरक्षित होते हैं, जिनका लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा हिंद महासागर से होकर गुजरता है।
लेख में यह भी कहा गया है कि व्यापार जर्मनी-भारत संबंधों की आधारशिला बना हुआ है। जर्मनी भारत का यूरोपीय संघ में सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और भारत के कुल ईयू व्यापार में उसकी हिस्सेदारी 25 प्रतिशत है।
वर्ष 2024 में वस्तुओं और सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार 50 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक रहा, जो 2025 में भी कायम रहा। 2025 में भारत को जर्मनी का निर्यात 18.3 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचा, जिसमें मशीनरी, विद्युत उपकरण और रसायन प्रमुख रहे। वहीं, भारत का जर्मनी को निर्यात, जिसमें दवाइयां और ऑटो कंपोनेंट्स शामिल हैं, 10.54 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
लेख के अनुसार, जर्मनी की “इंडिया फर्स्ट” नीति के तहत 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब यूरो तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसे विविधीकृत आपूर्ति शृंखलाओं के माध्यम से हासिल किया जाएगा।