क्या शब्दोत्सव 2026 में तेज सप्रू ने फिल्म इंडस्ट्री में बदलाव के बावजूद पुराने दौर की यादों को ताजा किया?
Key Takeaways
- फिल्म और साहित्य का संगम
- तेज सप्रू के अनुभव
- फिल्म इंडस्ट्री में बदलाव
- पुराने दौर की यादें
- छोटे प्रोड्यूसर्स की कठिनाइयाँ
नई दिल्ली, 4 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली में आयोजित 'शब्दोत्सव 2026' में फिल्म और साहित्य के संगम का अद्भुत नजारा देखने को मिला। इस अवसर पर बॉलीवुड अभिनेता तेज सप्रू ने फिल्म इंडस्ट्री के बदलते परिवेश तथा अपने अनुभवों को साझा किया।
तेज सप्रू ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में कहा, ''शब्दोत्सव का उद्देश्य विभिन्न विषयों पर खुलकर चर्चा करना और अपने विचार साझा करना है। हमें फिल्म जगत पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया गया। हमने इस विषय पर अपने गहरे विचार प्रस्तुत किए। ऐसे कार्यक्रम फिल्म उद्योग की प्रगति के लिए अत्यंत उपयोगी होते हैं।''
उन्होंने अपने लंबी फिल्मी यात्रा के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी। ''मैंने 1979 में फिल्म उद्योग में कदम रखा और तब से अब तक कई प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ काम करने का अवसर मिला। फिल्म इंडस्ट्री में बदलाव के बावजूद पुराने दौर की यादें हमेशा ताजा रहती हैं। पहले की फिल्मों में भावनाओं और संवेदनाओं की गहराई अधिक होती थी। उस समय फिल्म वितरण की प्रक्रिया भी भिन्न होती थी। मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में अलग-अलग डिस्ट्रीब्यूटर्स होते थे, जो अपने क्षेत्र के लिए फिल्में खरीदते और वितरित करते थे।''
उन्होंने बताया, ''पहले प्रोड्यूसर अपना पैसा वापस लेते थे और उसके बाद जो बचता था, उसे साझा किया जाता था। आजकल डिस्ट्रीब्यूटर्स की संख्या काफी कम हो गई है और पूरी प्रक्रिया उनके हाथ में सिमट गई है।''
सप्रू ने थिएटरों में आए बदलाव पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा, ''पहले सिंगल थिएटर हर जगह होते थे और फिल्मों का प्रदर्शन काफी लंबे समय तक चलता था। एक फिल्म 50 से 75 हफ्ते तक भी चल सकती थी और गोल्डन जुबली मिलना आम बात थी। मेरी कई फिल्मों ने गोल्डन जुबली का आनंद लिया है। अब सुपरहिट फिल्में भी सामान्यतः एक महीने से ज्यादा नहीं चल पाती हैं। चार हफ्ते चलने वाली फिल्में आज के समय में बड़ी सफलता मानी जाती हैं।''
उन्होंने कहा, ''इसका सबसे बड़ा असर छोटे प्रोड्यूसर्स पर पड़ा है। पहले 'ए', 'बी' और 'सी' श्रेणी के प्रोड्यूसर अपने-अपने स्तर पर फिल्मों का निर्माण और प्रदर्शन कर पाते थे, जिससे उनकी आजीविका चलती थी। आज छोटे और नए प्रोड्यूसर्स के लिए थिएटर पाना भी कठिन हो गया है। महंगाई और टिकट की बढ़ती कीमतों के कारण दर्शक कई बार फिल्म देखने नहीं जा पाते।''
तेज सप्रू ने पुराने समय की फिल्मों और संगीत की सुंदरता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, ''उस समय फिल्मों में छह-छह गाने होते थे और सभी हिट होते थे। गाने इतने लोकप्रिय और यादगार होते थे कि लोग आज भी उनकी पंक्तियाँ गुनगुनाते हैं। आज के समय में थिएटर में ऐसा होना बहुत मुश्किल है। संगीत का प्रभाव पहले जितना गहरा नहीं है।''
उन्होंने कहा, ''इस दौर की तुलना पुराने दौर से करने पर कई चीजों की कमी महसूस होती है। आज के समय में बड़े प्रोड्यूसर्स और मल्टीप्लेक्स की केंद्रीकृत व्यवस्था के कारण छोटे कलाकारों और फिल्म निर्माताओं को संघर्ष करना पड़ता है। पुराने दौर की व्यक्तिगत और पैशनेट अप्रोच, लंबे समय तक फिल्मों का प्रदर्शन और संगीत की महत्ता अब बदल चुकी है। फिल्म इंडस्ट्री में बदलाव स्वाभाविक हैं, लेकिन पुराने समय की गहराई और भावनाओं की याद हमेशा बनी रहेगी।''