क्या पेट में जलन, दर्द और भारीपन के पीछे अल्सर के संकेत हो सकते हैं?

सारांश
Key Takeaways
- जलन और दर्द अल्सर के संकेत हो सकते हैं।
- पित्त दोष का संतुलन महत्वपूर्ण है।
- आयुर्वेदिक उपायों से राहत मिल सकती है।
- जीवनशैली में बदलाव से समस्या को रोका जा सकता है।
- स्वास्थ्य का ध्यान रखना आवश्यक है।
नई दिल्ली, 28 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। वर्तमान की तेज गति वाली जीवनशैली में लोग अपनी सेहत की देखभाल करना भूल गए हैं। सुबह की शुरुआत जल्दीबाजी में होती है, दिन में काम का तनाव रहता है और रात को थक कर जो भी खाने को मिले, उसे खाकर सो जाना एक सामान्य आदत बन चुकी है। इस प्रकार की जीवनशैली का सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव हमारे पाचन तंत्र पर पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप पेट की कई गंभीर बीमारियां उत्पन्न हो सकती हैं। इनमें से एक गंभीर बीमारी है 'पेट का अल्सर'।
आधुनिक चिकित्सा इसे पेट की आंतरिक परत में घाव के रूप में देखती है, जबकि आयुर्वेद इसे केवल शारीरिक रोग नहीं मानता, बल्कि यह शरीर और मन के असंतुलन का संकेत भी है।
आयुर्वेद के अनुसार, जब शरीर की 'अग्नि', अर्थात् पाचन शक्ति, कमजोर हो जाती है और पित्त दोष बढ़ने लगता है, तब यह दोष पेट की नाज़ुक परत को प्रभावित करता है। धीरे-धीरे यह परत जलने लगती है और वहां घाव, यानी छाले, बनने लगते हैं। यही स्थिति पेट में अल्सर कहलाती है। इसे आयुर्वेद में 'परिणाम शूल' या 'अन्नवह स्रोतों का विकार' कहा गया है।
चरक संहिता में कहा गया है कि यह समस्या अचानक उत्पन्न नहीं होती; इसकी जड़ें हमारी दैनिक दिनचर्या में छिपी होती हैं। जब हम बार-बार चाय, कॉफी का सेवन करते हैं, तीखा और बासी खाना खाते हैं, खाली पेट रहते हैं या देर रात तक जागते हैं, तब शरीर में पित्त इकट्ठा होने लगता है। मानसिक तनाव और गुस्सा भी पित्त को और बढ़ाते हैं। जब यह पित्त अत्यधिक हो जाता है, तो यहां से अल्सर की शुरुआत होती है।
पेट में अल्सर होने पर सबसे पहले पेट के ऊपरी हिस्से में जलन या तेज दर्द महसूस होता है। भोजन करने के तुरंत बाद भारीपन महसूस होता है, एसिडिटी होती है, खट्टी डकारें आती हैं, और कई बार उल्टी या मतली की शिकायत भी होती है। कुछ मामलों में यह इतना गंभीर हो जाता है कि उल्टी में खून आने लगता है या मल काला पड़ने लगता है, जो साफ संकेत है कि स्थिति अब गंभीर हो गई है।
आधुनिक चिकित्सा इस पर एंटासिड, दर्द निवारक या एंटीबायोटिक देती है, जो तात्कालिक आराम तो देती हैं, लेकिन जब तक जीवनशैली में बदलाव नहीं लाया जाए, यह समस्या बार-बार लौटती रहती है। वहीं, आयुर्वेद का दृष्टिकोण अलग है। यह शरीर को उसकी प्राकृतिक स्थिति में वापस लाने, दोषों को संतुलित करने और पाचन शक्ति को मजबूत बनाने की बात करता है, ताकि शरीर स्वयं रोग से लड़ सके।
आयुर्वेद में कई सरल घरेलू उपाय बताए गए हैं, जिनका कोई साइड इफेक्ट नहीं है, जैसे मुलेठी, जिसका चूर्ण दूध या गुनगुने पानी के साथ लेने से पेट की परत को राहत मिलती है, शुद्ध देसी घी, जो पित्त को ठंडक देता है और अल्सर के घाव को भरने में मदद करता है, एलोवेरा जूस, आंवला, नारियल पानी, धनिया-सौंफ का पानी; और शतावरी चूर्ण... ये सभी पेट की रक्षा करते हैं और पाचन अग्नि को संतुलित करते हैं।