क्या सर्दियों में सांस पर हमला होता है: अस्थमा और सीओपीडी के अचानक बढ़ने का कारण क्या?
सारांश
Key Takeaways
- सर्दियों में ठंडी हवा अस्थमा और सीओपीडी को बढ़ा सकती है।
- फेफड़ों की वायुमार्ग ठंडी हवा से संकुचित हो सकते हैं।
- वायु प्रदूषण सीओपीडी के मामलों को बढ़ाता है।
- घर का वातावरण भी खतरनाक हो सकता है।
- वायरल संक्रमण से बचने के उपाय जरूरी हैं।
नई दिल्ली, 29 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। जैसे ही सर्दियों का आगाज़ होता है, ठंडी हवा का एहसास कई लोगों के लिए सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि सांस पर गंभीर प्रभाव डालने वाला बन जाता है। अस्थमा और सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह मौसम हर साल एक ही चिंता के साथ आता है—क्या अचानक सांस रुक जाएगी? क्या खांसी और कफ इतना बढ़ जाएगा कि उन्हें अस्पताल जाना पड़ेगा? चिकित्सकों का कहना है कि जैसे-जैसे तापमान घटता है, फेफड़ों के रास्ते सिकुड़ने लगते हैं और एक छोटा सा ट्रिगर भी बड़ा संकट पैदा कर सकता है।
इसी संदर्भ में, शोधकर्ता यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि सर्दियों में ये बीमारियाँ क्यों बढ़ जाती हैं। ब्रिटेन में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन “द कॉजेज एंड कॉसिक्योन्सेस ऑफ सीजनल वेरिएशन इन सीओपीडी” (२०१४) ने यह बताया कि सीओपीडी के रोगियों में दिसंबर से फरवरी के बीच फ्लेयर-अप की दर लगभग दोगुनी हो जाती है। इसी तरह, यूरोपियन रेस्पिरेटरी जर्नल में प्रकाशित (२०११) के अध्ययन ने भी यही निष्कर्ष निकाला है कि ठंड का मौसम सीओपीडी को अधिक गंभीर बना देता है और अस्पताल में भर्ती होने वाले मामलों में वृद्धि होती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि एक कारण ठंडी और सूखी हवा है। जब कोई व्यक्ति सांस लेता है, तो ठंडी हवा सीधे फेफड़ों की नलिकाओं को संकुचित कर देती है। ब्रोन्कोकन्सट्रिक्शन तेजी से बढ़ने पर मरीज को घबराहट, सीटी जैसी आवाज और सांस फूलने जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। दमे के मरीजों में यह प्रतिक्रिया और भी जल्दी होती है।
हाल ही में पोलैंड में किए गए एक शोध में यह भी पाया गया कि सिर्फ ठंड नहीं, बल्कि ठंड के साथ बढ़ता वायु प्रदूषण—विशेषकर पीएम 2.5 और पीएम 10—स्थिति को और खतरनाक बना देता है। यह अध्ययन साइंटिफिक रिपोर्ट (नेचर) में 2025 में प्रकाशित हुआ, जिसमें सर्दियों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर सीओपीडी और अस्थमा के मरीजों के अस्पताल में भर्ती होने की संभावना में वृद्धि दर्ज की गई।
सिर्फ बाहर की हवा नहीं, घर का वातावरण भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। सर्दियों में अधिकांश घर बंद रहते हैं, खिड़कियाँ कम खुलती हैं और हीटर, गैस-स्टोव, धुएं और बदली हुई नमी मिलकर अंदर की हवा को और हानिकारक बना देते हैं। एटमॉस्फियर जर्नल में प्रकाशित एक शोध (2021) ने तो यहां तक दिखाया कि हर 1 डिग्री सेल्सियस तापमान गिरने पर भी सीओपीडी बढ़ने का खतरा लगभग 1 फीसदी तक बढ़ सकता है। यानी जितनी ठंड, उतना जोखिम बढ़ता जाता है।
इन सबके बीच, सर्दी-जुकाम और वायरल संक्रमण की गतिविधियों का बढ़ना भी चिंता का विषय है। फ्लू और सामान्य सर्दी वाले वायरस इस मौसम में ज्यादा फैलते हैं। अगर ये वायरस पहले से संवेदनशील फेफड़ों में पहुंच जाएं, तो सूजन तेजी से बढ़ सकती है और मरीज को सांस लेने में कठिनाई हो सकती है। इसी कारण, चिकित्सक सर्दियों में वैक्सीन, मास्क और भीड़ से बचने पर जोर देते हैं।