क्या आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ‘अहिंसा संस्कार पदयात्रा’ निकाल रहे हैं?
सारांश
Key Takeaways
- मानवता का संदेश फैलाना
- नैतिकता को पुनर्जीवित करना
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार
- सामाजिक एकता को प्रेरित करना
- उपवास के फायदे बताना
बहरोड़ (राजस्थान), 12 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ‘अहिंसा संस्कार पदयात्रा’ का आयोजन कर रहे हैं। इस यात्रा का प्राथमिक लक्ष्य समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से संवाद करना और उन्हें मानवता का संदेश देकर उनके भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना है।
आचार्य का मानना है कि वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और विनोबा भावे से प्रेरित होकर यह यात्रा निकाल रहे हैं। उनका विश्वास है कि आने वाले दिनों में यह यात्रा लोगों के बीच एक स्थायी प्रभाव छोड़ेगी। उन्होंने इस यात्रा के बारे में सोमवार को पत्रकारों से संवाद करते हुए सभी जानकारी साझा की।
उन्होंने बताया कि इस यात्रा का आरंभ 2 अक्टूबर 2004 को गुवाहाटी और असम से हुआ था। उस समय वहां के राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने हमसे पूछा था कि इस यात्रा का उद्देश्य क्या है? आप इस यात्रा के माध्यम से आम लोगों में क्या संदेश देना चाहते हैं? हमने स्पष्ट किया कि आज के समय में लोगों के बीच नैतिकता और भाईचारा समाप्त हो चुका है। हम इस यात्रा के जरिए लोगों के बीच नैतिकता को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। यदि हम इसमें सफल होते हैं, तो हमारी यात्रा सार्थक साबित होगी।
आचार्य ने कहा कि आज लोगों के बीच नैतिकता और भाईचारा अपनी मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुका है। हमारा उद्देश्य इस यात्रा के माध्यम से इसी भाईचारे और नैतिकता को जीवित करना है। नैतिकता को हम कई तरीकों से पुनर्जीवित कर सकते हैं, जैसे पेड़ लगाना। अपने घर के पास एक ऐसा पेड़ लगाएं जिससे आपके पड़ोसी को भी उसकी छांव मिले। इस तरह आप अपनी नैतिकता को जीवित रख सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य चाहे, तो वह अपने स्तर को बढ़ा सकता है। आज मनुष्य किस स्तर पर पहुंच चुका है, इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उसकी स्थिति पशुओं से भी बदतर हो चुकी है। उसका भोजन और स्नान का कोई निश्चित समय नहीं है। उसकी दुर्दशा अपने चरम पर पहुंच चुकी है, लेकिन वह सुधार की ओर बढ़ता नहीं दिखाई दे रहा है।
आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ने कहा कि साधुओं की स्थिति देखिए। हम लोग दिन में एक बार भोजन करते हैं और 30 से 35 किलोमीटर आराम से चल लेते हैं। हमें इसमें कोई कठिनाई नहीं होती। वहीं, आज के मनुष्य की दुर्दशा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह एक दिन में कई बार भोजन करता है, लेकिन मंदिर जाने की जहमत नहीं उठाता। ऐसे में आप उसकी ईश्वर के प्रति निष्क्रियता का अंदाजा लगा सकते हैं। आज का मनुष्य खाने के लिए जी रहा है और मरने का इंतजार कर रहा है।
आचार्य ने कहा कि हमने दिल्ली में भारत मंडपम में लोगों से माह में एक दिन का उपवास रखने की अपील की। हमने उपवास के फायदों के बारे में बताया। यदि आप हर महीने एक दिन उपवास रखते हैं, तो इससे आप कई बीमारियों से बच सकते हैं। आज की जीवनशैली ऐसी हो गई है कि मनुष्य दिन भर भोजन करता है, लेकिन उपवास नहीं करता। इस तरह की अव्यवस्थित जीवनशैली से वह बीमारियों को आमंत्रित करता है। हर आदमी को स्वस्थ जीवन के लिए महीने में कम से कम चार उपवास करने चाहिए। यदि आप चार नहीं कर सकते, तो दो करें। यदि दो भी नहीं कर सकते, तो एक करें। यदि आप एक भी नहीं कर सकते, तो आपका जीवन व्यर्थ है।
उन्होंने कहा कि यह जीवन मरने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए है। हम इस अभियान को लोगों तक पहुंचा रहे हैं। इस अभियान में कई गणमान्य लोग जुड़े हुए हैं, जिनमें बाबा रामदेव भी शामिल हैं। इस अभियान के तहत हम सभी लोगों से हर महीने की सात तारीख को एकजुट होने की अपील करते हैं। तब सभी लोग उपवास करते हैं। इस तरह हम उपवास के फायदों के बारे में जागरूक करते हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस अभियान का किसी भी धर्म विशेष से कोई संबंध नहीं है। यह न तो हिंदू है, न मुस्लिम, न सिख और न ही ईसाई। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य लोगों के बीच मानवता का संदेश फैलाना है, जिसकी रूपरेखा पहले से निर्धारित है और हम उसी के अनुसार कार्य कर रहे हैं।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी उपवास को प्राथमिकता देते हैं। वे हर विशेष अवसर पर उपवास करते हैं। इससे पहले जितने भी राजनेता रहे हैं, उन्होंने उपवास को कभी महत्व नहीं दिया। लेकिन नरेंद्र मोदी ने इसे अपने जीवन में शामिल किया है। उनके जैसे प्रधानमंत्री का होना देश के लिए सौभाग्य की बात है। आज देश तेजी से विकास की राह पर अग्रसर है, जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता।
इसके अलावा, उन्होंने उपवास की व्यापक परिभाषा को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि उपवास का अर्थ केवल खाद्य पदार्थों का त्याग नहीं है, बल्कि भौतिक सुख-सुविधाओं से भी खुद को वंचित करना है। आज की दुनिया में भौतिकता हमें पराधीन बना चुकी है। ऐसी स्थिति में हमें उपवास के अंतर्गत विभिन्न छोटे-मोटे फैसले करने चाहिए। जैसे कि एक दिन पैदल चलने का या एक दिन बिना इंटरनेट के रहने का निर्णय।
उन्होंने अपनी दिनचर्या के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि मैंने पिछले 37 साल से स्नान नहीं किया है। दिन में एक बार ही भोजन करते हैं और न ही किसी प्रकार का साबुन या तेल का उपयोग करते हैं। हम आनंद का जीवन जीते हैं। यदि हम जैसे साधु ऐसा जीवन जी सकते हैं, तो आम आदमी भी ऐसा कर सकता है।