क्या अजित पवार 'दादा' कभी सत्ता से बाहर हुए?
सारांश
Key Takeaways
- अजित पवार का निधन महाराष्ट्र की राजनीति के लिए एक बड़ी क्षति है।
- उन्होंने १९८२ में राजनीति में कदम रखा।
- बड़े नेता के रूप में उनकी पहचान 'दादा' के नाम से बनी।
- उनकी राजनीतिक विरासत और बारामती क्षेत्र में उनका योगदान महत्वपूर्ण है।
- उन्होंने कई महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाला।
मुंबई, 28 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। महाराष्ट्र के बारामती में मंगलवार सुबह एक विमान दुर्घटना में राज्य के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का निधन हो गया। इस हादसे में अजित पवार के अलावा विमान में सवार सभी व्यक्तियों की भी मौत हो गई। जैसे ही यह खबर सामने आई, महाराष्ट्र और पूरे देश की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई।
महाराष्ट्र की राजनीति में 'दादा' के नाम से मशहूर अजित पवार को सत्ता और संगठन दोनों में एक मजबूत नेता के रूप में जाना जाता था। उन्होंने अपने चाचा और एनसीपी के प्रमुख शरद पवार की मदद से राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे राज्य की राजनीति में एक प्रमुख चेहरा बन गए।
अजित पवार का जन्म २२ जुलाई १९५९ को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के देवलाली प्रवरा में हुआ था। वह शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव पवार के पुत्र थे। उनके पिता ने प्रसिद्ध 'राजकमल स्टूडियो' में काम किया। अजित पवार की शादी सुनेत्रा पवार से हुई और उनके दो बेटे हैं, जिनके नाम पार्थ पवार और जय पवार हैं।
उन्होंने बारामती के महाराष्ट्र एजुकेशन सोसायटी हाई स्कूल से अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। उनके कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़कर पूरी तरह से राजनीति में ध्यान केंद्रित किया।
अजित पवार ने १९८२ में, केवल २० वर्ष की आयु में, राजनीति में कदम रखा। उन्होंने शुरू में एक सहकारी चीनी मिल के बोर्ड का चुनाव लड़ा। इसके पश्चात १९९१ में वे पुणे सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष बने और लगभग १६ वर्षों तक इस पद पर कार्यरत रहे।
उसी वर्ष १९९१ में उन्होंने बारामती संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव भी जीते, लेकिन बाद में यह सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए छोड़ दी। इसके बाद शरद पवार केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो गए और अजित पवार ने महाराष्ट्र की राजनीति की जिम्मेदारी संभाली।
अजित पवार पहली बार १९९५ में बारामती विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। इसके बाद उन्होंने १९९५, १९९९, २००४, २००९, २०१४, २०१९ और २०२४ में लगातार जीत हासिल की। बारामती को पवार परिवार का गढ़ माना जाता है और उनका यहाँ से गहरा संबंध रहा।
सरकार में रहते हुए उन्होंने कृषि, ऊर्जा, योजना, ग्रामीण विकास और जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले। कृष्णा घाटी और कोकण सिंचाई परियोजनाओं की जिम्मेदारी भी उनके पास थी।
बारामती क्षेत्र के विकास, कृषि ढांचे को मजबूत करने और सहकारी संस्थाओं को आगे बढ़ाने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है। जनता उन्हें प्यार से 'दादा' कहकर बुलाती थी। २०२४ के चुनाव में यहाँ 'पवार बनाम पवार' की रोचक लड़ाई देखने को मिली, जिसमें अजित पवार ने अपने भतीजे युगेंद्र पवार को भारी मतों से हराया।
अजित पवार का नाम उन नेताओं में शामिल है जो सबसे अधिक बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने। उपमुख्यमंत्री के रूप में उनका पहला कार्यकाल १० नवंबर २०१० से २५ सितंबर २०१२ तक रहा। दूसरा कार्यकाल २५ अक्टूबर २०१२ से २६ सितंबर २०१४ तक, तीसरा कार्यकाल २३ नवंबर २०१९ से २६ नवंबर २०१९ तक, चौथा कार्यकाल ३० दिसंबर २०१९ से २९ जून २०२२ तक और पाँचवां कार्यकाल २ जुलाई २०२३ से २०२४ तक रहा। दिसंबर २०२४ से वे देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के साथ महाराष्ट्र के वर्तमान उपमुख्यमंत्री के रूप में कार्यरत थे।
साल २०२३ में, अजित पवार ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय लेते हुए अपने चाचा शरद पवार से अलग रास्ता चुना। उन्होंने एनसीपी के कई विधायकों के साथ भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति सरकार का समर्थन किया।