क्या बसंत पंचमी पर भक्त मां सरस्वती और ब्रह्मा का संयुक्त आशीर्वाद लेने आते हैं? इस मंदिर की प्रतिमा है अनोखी!

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क्या बसंत पंचमी पर भक्त मां सरस्वती और ब्रह्मा का संयुक्त आशीर्वाद लेने आते हैं? इस मंदिर की प्रतिमा है अनोखी!

सारांश

बसंत पंचमी के अवसर पर मां सरस्वती और ब्रह्मा का अद्भुत मंदिर भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है। यहां एक ही पत्थर में उकेरी गई प्रतिमाएं, विशेष अनुष्ठान और अक्षराभ्यास की परंपरा इसे और भी खास बनाती हैं। जानें इस मंदिर के अनोखे इतिहास के बारे में।

Key Takeaways

  • मंदिर में मां सरस्वती और ब्रह्मा की प्रतिमा एक ही पत्थर में बनी है।
  • बसंत पंचमी पर भक्त विशेष पूजा करते हैं।
  • यह मंदिर शिक्षा और संस्कृति को बढ़ावा देता है।

नई दिल्ली, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। राजस्थान के पुष्कर में स्थित श्री ब्रह्मा सरस्वती मंदिर के बारे में सभी को जानकारी है, जहां ज्ञान, बुद्धि और संगीत की देवी मां सरस्वती की पूजा ब्रह्मा के साथ की जाती है। लेकिन, तेलंगाना में भी मां सरस्वती और ब्रह्मा का एक अद्वितीय मंदिर है, जहां बसंत पंचमी के लिए खास अनुष्ठान और पूजा-यज्ञ का आयोजन किया जाता है।

यह मंदिर अन्य मंदिरों की प्रतिमाओं से काफी अलग है। यहां मां सरस्वती और ब्रह्मा की प्रतिमा को एक ही पत्थर में उकेरकर बनाया गया है।

तेलंगाना के सूर्यापेट जिले के पलामरी गांव में स्थित यह मंदिर अपनी अनोखी प्रतिमा के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह देश का पहला मंदिर है, जहां एक ही पत्थर में मां सरस्वती और ब्रह्मा की प्रतिमा को बारीकी से उकेरा गया है। इस अद्वितीय कला को काकतीय कहा जाता है। काकतीय काल में एक ही पत्थर में दो प्रतिमाओं को उकेरने की कला को बहुत अच्छे तरीके से किया जाता था।

बसंत पंचमी के दिन मंदिर में भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं। भक्त मां सरस्वती और ब्रह्मा का संयुक्त आशीर्वाद लेने आते हैं। इस अवसर पर मां सरस्वती को पीले वस्त्र भेंट कर भक्त अपनी मनोकामना मांगते हैं। मंदिर में बसंत पंचमी के अवसर पर अक्षराभ्यास की परंपरा होती है, जिसमें छोटे बच्चों को अक्षर लिखने का अभ्यास कराया जाता है। इसके अलावा, संगीत और कला के प्रति आस्था रखने वाले भक्त भी मां सरस्वती की विशेष पूजा करते हैं। यह मंदिर बच्चों को साक्षरता सिखाने और उनकी शिक्षा एवं स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए प्रसिद्ध है।

मंदिर के इतिहास की बात करें तो इसका निर्माण 12वीं सदी में काकतीय राजा गणपतिदेव के शासन काल में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि काकतीय काल के राजा जागीरदार राजा रामिरेड्डी और बेथिरेड्डी ने मंदिर की नींव रखी थी। इस मंदिर में एक अनोखी परंपरा भी जारी है, जिसमें मां सरस्वती की साड़ी उन भक्तों को भेंट की जाती है, जिन्होंने शब्दों से नहीं बल्कि मधुर आवाज से गाया। उन भक्तों को मां की पहनी हुई साड़ी आशीर्वाद स्वरूप दी जाती है, जो कला और संगीत के प्रति उनकी गहरी भक्ति को दर्शाता है।

Point of View

बल्कि यह शिक्षा और संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र भी है। काकतीय काल के अद्वितीय शिल्प कला को आज भी संरक्षित किया गया है, जो हमारे समृद्ध इतिहास का प्रतीक है।
NationPress
22/01/2026

Frequently Asked Questions

बसंत पंचमी पर इस मंदिर में क्या विशेष अनुष्ठान होते हैं?
बसंत पंचमी पर इस मंदिर में विशेष पूजा-यज्ञ और अक्षराभ्यास की परंपरा होती है, जिसमें बच्चे अक्षर लिखने का अभ्यास करते हैं।
इस मंदिर की प्रतिमा की विशेषता क्या है?
इस मंदिर में मां सरस्वती और ब्रह्मा की प्रतिमा को एक ही पत्थर में उकेरा गया है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाता है।
मंदिर का निर्माण कब हुआ था?
इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में काकतीय राजा गणपतिदेव के शासन काल में हुआ था।
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