क्या भगवानदास रैकवार को प्राचीनतम युद्ध शैलियों के संरक्षक के रूप में पद्मश्री सम्मान मिला?
सारांश
Key Takeaways
- भगवानदास रैकवार को पद्मश्री सम्मान मिला है।
- उन्होंने प्राचीन युद्ध कलाओं का संरक्षण किया है।
- अखाड़ा संस्कृति अनुशासन और आत्मसंयम सिखाता है।
- उनका योगदान सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखने में महत्वपूर्ण है।
- उन्होंने अनेक प्रदेशों में प्रशिक्षण दिया है।
सागर, २५ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है। मध्य प्रदेश के सागर जिले के निवासी ८३ वर्षीय लोक कलाकार भगवानदास रैकवार को पद्मश्री सम्मान प्रदान किया जाएगा। उनका नाम पद्म पुरस्कारों की अनसंग हीरोज श्रेणी में शामिल किया गया है।
भगवानदास रैकवार कई वर्षों से सागर में छत्रसाल अखाड़ा का संचालन कर रहे हैं और पारंपरिक अखाड़ा संस्कृति, लाठी, तलवार और अन्य प्राचीन युद्ध कलाओं के संरक्षण और प्रचार में सक्रिय हैं। पद्मश्री सम्मान की घोषणा के बाद सागर और आस-पास के क्षेत्रों में खुशी और गर्व का माहौल बन गया है। उन्हें लोग ‘रायकवार दाऊ’ के नाम से जानते हैं।
भगवानदास रैकवार ने अपनी कला को अपने गुरु और पिता से सीखा और इसे अपनी साधना बना लिया। उन्होंने न केवल मध्य प्रदेश बल्कि छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश के लखनऊ और हिमाचल प्रदेश में भी लोगों और छात्रों को पारंपरिक युद्ध कलाओं का प्रशिक्षण दिया है। सागर में वे दशकों से इस कला को सिखाते आ रहे हैं और नई पीढ़ी को इससे जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
भगवान दास रैकवार का कहना है कि अखाड़ा और पारंपरिक युद्ध कलाएं आज के समय में लगभग लुप्त होती जा रही हैं। इन्हें बचाने के लिए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया है और कई बार शासन-प्रशासन को पत्र लिखकर इस कला के संरक्षण की मांग की है ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रह सकें। उनके अनुसार, अखाड़ा केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्मसंयम और संस्कारों की शिक्षा भी देता है।
पद्मश्री सम्मान मिलने पर भगवान दास रैकवार ने अपनी खुशी व्यक्त की और राष्ट्र प्रेस से कहा कि इस सम्मान से उन्हें बहुत गर्व की अनुभूति हो रही है। उन्होंने कहा, “पद्म पुरस्कार में चयन होने पर ऐसा लग रहा है जैसे मुझे स्वर्ग मिल गया हो। मुझे अनसंग हीरोज श्रेणी में यह सम्मान मिला है, जो मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।”
उन्होंने बताया कि यह पुरस्कार उन्हें प्राचीनतम युद्ध शैलियों लाठी, तलवार और अखाड़ा संस्कृति में उत्कृष्ट योगदान के लिए मिला है।
भगवान दास रैकवार ने बताया कि उन्होंने करीब ६० वर्षों तक अखाड़ा संस्कृति के साथ काम किया है। खास बात यह है कि उन्होंने बैंक में नौकरी करते हुए भी इस कला को कभी नहीं छोड़ा। वे नौकरी के साथ-साथ प्रशिक्षण और कार्यक्रमों का संचालन करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा शायद ही कोई प्रदेश होगा, जहां उनके अखाड़ा और पारंपरिक कलाओं से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन न हुआ हो।
पद्मश्री सम्मान की घोषणा के बाद भगवान दास रैकवार और उनके परिवार में खुशी का माहौल है। उन्होंने केंद्र सरकार और चयन समिति का आभार व्यक्त किया है। उनके परिवार के सदस्यों और शिष्यों ने भी इस सम्मान को अखाड़ा संस्कृति और लोक कलाओं के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया है।