क्या अंतरराष्ट्रीय व्यापार स्वेच्छा से होना चाहिए? : मोहन भागवत

सारांश
Key Takeaways
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार स्वेच्छा से होना चाहिए।
- आत्मनिर्भरता ही विकास की कुंजी है।
- विविधता और अलग-अलग विचारधाराएं विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए।
- वसुधैव कुटुम्बकम् का सिद्धांत परस्पर निर्भरता पर आधारित है।
- व्यक्तिगत अहंकार से परे होना चाहिए।
नई दिल्ली, 27 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ में आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार दबाव में नहीं, बल्कि स्वेच्छा से होना चाहिए.
डॉ. मोहन भागवत ने इस कार्यक्रम के दौरान कहा कि हर चीज की कुंजी केवल आत्मनिर्भरता है और विकास का प्रयास भी। हमारा राष्ट्र आत्मनिर्भर होना चाहिए, और यह प्रयास घर से शुरू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब हम स्वदेशी की बात करते हैं, तो ऐसा नहीं है कि विदेशों से संबंध समाप्त हो जाएंगे। आत्मनिर्भरता का मतलब यह नहीं है कि आयात पर रोक लगाई जाए।
उन्होंने कहा कि दुनिया परस्पर निर्भरता पर निर्भर करती है। वसुधैव कुटुम्बकम् का सिद्धांत भी इसी पर आधारित है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार चलता रहेगा और इसमें लेनदेन भी होगा, लेकिन यह दबाव में नहीं, बल्की स्वेच्छा से होना चाहिए।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत का भारी शुल्क लगाने के बाद उनकी यह टिप्पणी आई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 'सच्चा स्वदेशी' स्वैच्छिक वैश्विक जुड़ाव है, न कि मजबूरी। आरएसएस प्रमुख ने संयम और समावेशिता के भारत के मूल्यों पर भी चर्चा की।
उन्होंने कहा, "भारत ने हमेशा संयम बरता है और अपने नुकसानों को नजरअंदाज किया है। नुकसान होने पर भी, उसने मदद की पेशकश की है, यहां तक कि नुकसान पहुंचाने वालों को भी। व्यक्तिगत अहंकार दुश्मनी पैदा करता है, लेकिन उस अहंकार से परे हिंदुस्तान है।"
भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि विविधता और अलग-अलग विचारधाराएं विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए। उन्होंने कहा, "किसी को देखने के बाद, अगर उसकी जाति हमारे दिमाग में आती है, तो यह समस्या है, और इसे खत्म करना होगा। जल, श्मशान और मंदिर सबके लिए हैं। उनके बीच कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।"
वसुधैव कुटुम्बकम (विश्व एक परिवार है) पर आधारित हिंदू विचारधारा पर जोर देते हुए भागवत ने कहा कि संघ अपने कार्यों का श्रेय नहीं चाहता, बल्कि चाहता है कि भारतीय समाज देश को उस स्तर तक ले जाए जो वैश्विक परिवर्तन को प्रभावित कर सके। उन्होंने अनुशासन, पारिवारिक मूल्यों और सामुदायिक सेवा के माध्यम से हिंदुओं की तीन पीढ़ियों को आकार देने में विदेशों में आरएसएस शाखाओं की भूमिका की भी सराहना की।