क्या जातिगत जनगणना न करना पीडीए समाज के खिलाफ भाजपाई साजिश है?: अखिलेश यादव
सारांश
Key Takeaways
- जातिगत जनगणना का अभाव सामाजिक न्याय को प्रभावित करता है।
- अखिलेश यादव ने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
- पीडीए समाज को अपने अधिकारों के लिए लड़ना होगा।
- विपक्ष का आरोप है कि भाजपा ने समाज को धोखा दिया है।
- राजनीतिक बहस इस मुद्दे पर लगातार जारी है।
लखनऊ, २४ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जनगणना की अधिसूचना में जाति का कॉलम न होने को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि जातिगत जनगणना न करना पीडीए (पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक) समाज के खिलाफ एक भाजपाई साजिश है।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने शनिवार को सोशल मीडिया पर लिखा, "जनगणना की अधिसूचना में जाति का कॉलम नहीं है, फिर गिनेंगे क्या? जातिगत जनगणना तो भाजपा का एक जुमला है।"
उन्होंने कहा कि भाजपा का सीधा फार्मूला है- न गिनती होगी, न आरक्षण का आधार बनेगा। उन्होंने आगे लिखा कि जो लोग आज भाजपा पर भरोसा कर रहे हैं, वे खुद को ठगा हुआ और अपमानित महसूस कर रहे हैं।
भाजपा के कार्यकर्ता और नेता, जो जातिगत जनगणना करवाने का दावा कर रहे थे, अब अपने समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं बचे हैं। उन्हें अब भाजपा का झंडा उतारने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
अखिलेश यादव ने कहा कि पीडीए को अपने मान-सम्मान, आरक्षण और अधिकारों की लड़ाई खुद लड़नी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि जब विरोध होगा तो ‘छलजीवी भाजपा’ फिर कहेगी कि यह टाइपिंग मिस्टेक हो गई। भाजपा अब इतनी बुरी तरह एक्सपोज हो चुकी है कि सबको पता है कि वह अपने गलत मंसूबों के भंडाफोड़ के बाद क्या करेगी।
दरअसल, यह भाजपाई चालाकी नहीं, बल्कि बेशर्मी है। सपा मुखिया ने लिखा कि अब शब्दकोश में ‘वचन-विमुखी’ भाजपा का मतलब ‘धोखा’ होना चाहिए। यह ध्यान देने योग्य है कि जातीय जनगणना को लेकर विभिन्न राजनीतिक दल लगातार सरकार से सवाल उठाते रहे हैं। विशेष रूप से, विपक्षी दलों के नेताओं ने समय-समय पर इस मुद्दे को उठाकर केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास किया है।
विपक्ष का आरोप है कि जातीय जनगणना के बिना सामाजिक न्याय, समान भागीदारी और आरक्षण की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ सकती। इसके बावजूद, सरकार की ओर से इस विषय पर स्पष्ट और ठोस पहल न किए जाने के कारण राजनीतिक बहस तेज होती रही है।
-- राष्ट्र प्रेस
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