क्या आदिवासी ही हमारे धर्म के मूल हैं, दूसरों के पूजा तरीकों का भी करें सम्मान: मोहन भागवत?

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क्या आदिवासी ही हमारे धर्म के मूल हैं, दूसरों के पूजा तरीकों का भी करें सम्मान: मोहन भागवत?

सारांश

डॉ. मोहन भागवत ने आदिवासी समुदाय के लोगों के साथ संवाद किया और बताया कि आदिवासी हमारे धर्म के मूल हैं। उन्होंने पूजा के विभिन्न तरीकों का सम्मान करने की आवश्यकता पर जोर दिया। जानें उनकी अहम बातें इस खास कार्यक्रम से।

Key Takeaways

  • आदिवासी
  • पूजा
  • विविधता में एकता का संदेश महत्वपूर्ण है।
  • धर्म का सार प्रकृति के साथ जुड़ा है।
  • हमारे पूर्वजों के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।

रांची, 24 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शनिवार को झारखंड की राजधानी रांची में आदिवासी समुदाय के लोगों के साथ संवाद किया। यह कार्यक्रम कार्निवल बैंक्वेट हॉल में आयोजित हुआ। उन्होंने कहा कि जिन्हें आज आदिवासी कहा जाता है, वही हमारे धर्म के मूल हैं।

मोहन भागवत ने कहा कि विविधता में एकता हमारे पूर्वजों में निहित है। पूजा के अनगिनत तरीके हो सकते हैं, और प्रत्येक का सम्मान होना चाहिए। सभी प्रकार की पूजा को स्वीकार करें और उनका आदर करें, क्योंकि वे सभी वैध हैं। अपनी पद्धति से पूजा करें। दूसरों की पूजा के तरीकों का भी सम्मान करें, उन्हें स्वीकार करें, और सद्भाव में आगे बढ़ें। यही हमारे देश का स्वाभाविक सार है। आपको यह जानना चाहिए कि धर्म का सार प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है।

उन्होंने आगे कहा कि पहले हमारे पूर्वज जंगलों और आश्रमों में रहते थे। वे खेती करते थे और जंगल के संसाधनों पर निर्भर थे। उस समय जो अनुभव प्राप्त हुआ, वही उपनिषदों में वर्णित है। आदिवासी उनके विचारों का अनुसरण करते हैं। अब कुछ लोग कहते हैं कि ये लोग हिंदू नहीं हैं क्योंकि इनकी पूजा अलग है, तो क्या हमारे देश में कभी एक ही पूजा रही है?

सबसे पुराने वेदों में लिखा है कि अनेक भाषा बोलने वाले और अनेक धर्मों को मानने वाले लोग पृथ्वी माता पर निवास करते हैं। जैसे गाय विभिन्न धाराओं से सबको दूध देती है, वैसे ही हमें इनको आश्रय प्रदान करना चाहिए।

इसके अलावा, मोहन भागवत ने कहा कि इस लंबे समय में कई विकास हुए हैं, और स्वाभाविक रूप से, समय के साथ-साथ विचार और संस्कृति के उच्च स्तर विकसित हुए हैं। फिर भी, जिस एकता से हमने शुरुआत की थी, वह आज तक बनी हुई है। यही हमारा इतिहास है। जिसे हम अब 'हिंदू' या 'हिंदू धर्म' कहते हैं, उसकी शुरुआत कैसे हुई? 'हिंदू' नाम बहुत बाद में आया और धर्म की अवधारणा समय के साथ विकसित हुई। यदि हम सनातन धर्म की उत्पत्ति का पता लगाने का प्रयास करें तो इसकी जड़ें हमारे देश के जंगलों और कृषि पद्धतियों में हैं।

उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह हुआ कि जिन्हें आज आदिवासी कहा जाता है, वही हमारे धर्म के मूल हैं। वेदों का मूल खोजने के लिए हमें वहीं जाना पड़ेगा। आज के आदिवासी समाज का कोई धर्म नहीं है, यह गलत है। धर्म का अर्थ है कि पूजा करो, और पूजा पहले से चली आ रही है। पूजा के पीछे का विचार भी तब से चला आ रहा है। इसका अनुसंधान करेंगे तो हमें यह सब उपनिषदों से मिलेगा।

Point of View

बल्कि हमारे समाज की विविधता को भी उजागर करता है। मोहन भागवत का यह संवाद हमें एकता और सम्मान का संदेश देता है, जो हमारे समाज के लिए आवश्यक है।
NationPress
04/02/2026

Frequently Asked Questions

मोहन भागवत ने आदिवासी समुदाय के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि जिन्हें आज आदिवासी कहा जाता है, वही हमारे धर्म के मूल हैं और पूजा के विभिन्न तरीकों का सम्मान होना चाहिए।
क्या आदिवासी हिंदू नहीं हैं?
मोहन भागवत ने कहा कि यह गलत है। आदिवासी समाज का कोई धर्म नहीं है, यह समझना गलत है।
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