NHRC का झारखंड सरकार को अल्टीमेटम: खूंटी में नाबालिग शिवा की पुलिस कस्टडी पिटाई पर ₹1 लाख मुआवजा दें, FIR करें
सारांश
Key Takeaways
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने झारखंड के खूंटी जिले में 16 वर्षीय नाबालिग शिवा कुमार सिंह की पुलिस हिरासत में बर्बर पिटाई के मामले में राज्य सरकार को कड़ा अल्टीमेटम जारी किया है। आयोग ने झारखंड सरकार को स्पष्ट आदेश दिया है कि पीड़ित बच्चे को ₹1 लाख का मुआवजा दिया जाए और दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अविलंब एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए। यह मामला 16 फरवरी 2025 का है जब खूंटी पुलिस ने कोसंबी गांव में एक मानव तस्करी के संदिग्ध की तलाश में पहुँचकर उसके नाबालिग बेटे को जबरन थाने उठा लिया था।
मुख्य घटनाक्रम
16 फरवरी 2025 को खूंटी पुलिस मानव तस्करी के एक संदिग्ध की तलाश में कोसंबी गांव पहुँची। संदिग्ध के घर पर न मिलने पर पुलिस ने न केवल घर में तोड़फोड़ की, बल्कि उसके 16 वर्षीय बेटे शिवा कुमार सिंह को जबरन उठाकर खूंटी महिला थाने ले आई। आरोप है कि थाने में सब-इंस्पेक्टर संतोष रजक ने बच्चे के पिता का ठिकाना उगलवाने के लिए उसकी इतनी बेरहमी से पिटाई की कि वह चलने-फिरने और बैठने तक में असमर्थ हो गया।
इस अमानवीय कृत्य के विरुद्ध चाइल्ड राइट्स फाउंडेशन के सचिव बैद्यनाथ कुमार ने NHRC में शिकायत दर्ज कराई, जिस पर संज्ञान लेते हुए आयोग ने यह कार्रवाई की।
NHRC की कड़ी टिप्पणी
मानवाधिकार आयोग ने अपनी कार्यवाही में इस कृत्य को भारतीय न्याय संहिता-2023 और किशोर न्याय अधिनियम का खुला उल्लंघन करार दिया। आयोग ने सख्त शब्दों में कहा कि एक निर्दोष बच्चे को थाने लाकर पीटना उसके 'जीवन के अधिकार' और 'गरिमा के साथ जीने के अधिकार' का स्पष्ट हनन है। गौरतलब है कि यह मामला बाल अधिकारों के संरक्षण को लेकर देश में बढ़ती चिंताओं के बीच सामने आया है।
सरकार की प्रतिक्रिया
झारखंड सरकार ने आयोग को सूचित किया है कि ₹1 लाख के मुआवजे की राशि को मंजूरी दे दी गई है और जल्द ही पीड़ित परिवार को हस्तांतरित कर दी जाएगी। हालाँकि, आयोग ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई है कि अब तक दोषी अधिकारी सब-इंस्पेक्टर संतोष रजक के खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया गया है।
यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में पुलिस हिरासत में हिंसा के मामलों पर न्यायालयों और मानवाधिकार निकायों की नज़र तेज़ हुई है। आलोचकों का कहना है कि मुआवजे की स्वीकृति और आपराधिक कार्यवाही से बचने की प्रवृत्ति दोषी पुलिसकर्मियों को अप्रत्यक्ष संरक्षण देती है।
आम जनता और बाल अधिकारों पर असर
यह मामला उन हज़ारों परिवारों के लिए चेतावनी है जो कानून-व्यवस्था की आड़ में पुलिस के मनमाने रवैये के शिकार होते हैं। किशोर न्याय अधिनियम के तहत किसी नाबालिग को बिना उचित प्रक्रिया के हिरासत में लेना और उसके साथ शारीरिक हिंसा करना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। बाल अधिकार संगठनों ने माँग की है कि दोषी अधिकारी को तत्काल निलंबित कर मुकदमा चलाया जाए।
आगे क्या होगा
NHRC ने झारखंड सरकार को स्पष्ट कर दिया है कि दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करना अनिवार्य है और इसमें किसी भी विलंब को आयोग गंभीरता से लेगा। पीड़ित परिवार को मुआवजे का हस्तांतरण और दोषी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही — दोनों पर आयोग की नज़र बनी रहेगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार NHRC के अल्टीमेटम के बाद कितनी तेज़ी से और पारदर्शिता के साथ कदम उठाती है।