क्या स्मृति शेष में निखिल बनर्जी का सितार वादन जीवन को नया रूप देता है?

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क्या स्मृति शेष में निखिल बनर्जी का सितार वादन जीवन को नया रूप देता है?

सारांश

पंडित निखिल बनर्जी, भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक अनमोल रत्न, जिनकी धुनें दिल और आत्मा को छू जाती हैं। जानिए उनके जीवन की प्रेरणादायक कहानी और कैसे उन्होंने संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाई।

Key Takeaways

  • पंडित निखिल बनर्जी का जन्म 14 अक्टूबर 1931 को हुआ।
  • उन्होंने उस्ताद अलाउद्दीन खान से संगीत की शिक्षा ली।
  • उनका वादन ढेर सारी भावनाओं और गहराई से भरा होता था।
  • उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
  • उनकी धुनें आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में गूंजती हैं।

नई दिल्ली, 26 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत में पंडित निखिल बनर्जी का नाम उन सितारों में शामिल है जिनकी धुनें केवल कानों को ही नहीं, बल्कि दिल और आत्मा को भी छू जाती हैं। उनका सितार वादन ऐसा था कि हर बार सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे। पंडित रविशंकर और उस्ताद विलायत खान जैसे दिग्गजों के समय में भी निखिल ने अपनी एक अद्वितीय पहचान बनाई।

निखिल रंजन बनर्जी का जन्म १४ अक्टूबर १९३१ को कोलकाता के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता जितेंद्रनाथ बनर्जी भी सितार बजाने के शौकीन थे। संगीत का पहला बीज निखिल के जीवन में घर की दीवारों के बीच ही बो दिया गया था। जैसे ही नन्हें निखिल ने नौ साल की उम्र में सितार की तारों को छुआ, उनके भीतर संगीत की तीव्रता बढ़ गई। उस उम्र में ही उनकी उंगलियों में ऐसी पकड़ थी कि जैसे हर तार उनके दिल की धड़कन से जुड़ी हो।

उनकी असली यात्रा तब शुरू हुई जब उन्होंने मैहर घराने के महान उस्ताद अलाउद्दीन खान से तालीम लेना शुरू किया। कहा जाता है कि शुरू में बाबा, यानी उस्ताद अलाउद्दीन खान, निखिल को शिष्य बनाने के लिए राज़ी नहीं थे। लेकिन जब उन्होंने निखिल के रेडियो वादन को सुना, तो उन्होंने हामी भर दी।

मैहर पहुंचकर, निखिल को संगीत की असली कठोर साधना का सामना करना पड़ा। एक दिन, गुरु ने उनसे राग पूर्वी बजाने को कहा। युवा निखिल ने आत्मविश्वास के साथ बजाया, तकनीकी रूप से त्रुटिहीन। लेकिन जैसे ही उन्होंने तारों को शांत किया, उस्ताद अलाउद्दीन खान खड़े हो गए और उन्हें फटकार लगाई, "पूर्वी नहीं, मुर्गी बजाया, मुर्गी!" मतलब, तुमने राग नहीं, बल्कि बेजान धुन बजाई है।

यह फटकार किसी भी साधारण बच्चे के लिए तो करारी ठोकर जैसी होती, लेकिन निखिल बनर्जी के लिए यह उनके जीवन और संगीत की दिशा बदलने वाली सीख थी। गुरु का संदेश साफ था कि संगीत केवल उंगलियों का खेल नहीं, यह आत्मा की अभिव्यक्ति है। इसके बाद निखिल को गुरु के पास कमरे में रहकर सुबह ४ बजे से रात ११ बजे तक ट्रेनिंग करनी पड़ी।

निखिल बनर्जी के वादन की खासियत यही थी कि हर राग में एक अलग कहानी होती थी। चाहे राग मारवा की तीव्रता हो या दरबारी की शांति, उनकी उंगलियां हर तार को भावनाओं की गहराई तक ले जाती थीं। उनकी शैली में रूहानियत और ध्यान की शांति थी, जो सुनने वालों को भीतर तक छू जाती थी।

वैश्विक मंचों पर भी उनकी कला ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की गूंज फैलाई। न्यूयॉर्क से लंदन तक, उनके संगीत समारोहों में लोग समय को भूल जाते थे। १९६८ में उन्हें पद्मश्री, १९७४ में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और मरणोपरांत १९८७ में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

२७ जनवरी १९८६ को केवल ५४ वर्ष की उम्र में निखिल बनर्जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी धुनें आज भी गूंजती हैं। उनके रिकॉर्ड्स सुनें, तो ऐसा लगेगा जैसे वे अभी भी कहीं पास बैठकर सितार बजा रहे हों। उनके संगीत की गहराई, उनकी साधना और उनकी आत्मा की आवाज हमेशा भारतीय शास्त्रीय संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित रहेगी।

Point of View

बल्कि उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। हमें उनकी कला को संजोकर रखना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों को इससे प्रेरित करना चाहिए।
NationPress
04/02/2026

Frequently Asked Questions

पंडित निखिल बनर्जी का जन्म कब हुआ?
पंडित निखिल बनर्जी का जन्म 14 अक्टूबर 1931 को कोलकाता में हुआ।
उन्हें किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया?
उन्हें 1968 में पद्मश्री, 1974 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1987 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।
उनकी संगीत यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?
उनकी संगीत यात्रा की शुरुआत उस्ताद अलाउद्दीन खान से तालीम लेकर हुई।
निखिल बनर्जी का वादन किस तरह की खासियत लिए हुए था?
उनके वादन में हर राग के साथ एक अलग कहानी होती थी, जो सुनने वालों को भावनाओं की गहराई तक ले जाती थी।
पंडित निखिल बनर्जी का योगदान भारतीय संगीत में क्या है?
उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई और उनकी धुनें आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं।
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