क्या पानीपत हैंडलूम के 'अनसंग हीरो' खेमराज सुंदरियाल को मिला पद्मश्री?
सारांश
Key Takeaways
- खेमराज सुंदरियाल को पद्म श्री से सम्मानित किया गया है।
- उन्होंने पानीपत के हैंडलूम उद्योग को नई पहचान दी है।
- उनकी नवाचार ने उद्योग में क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं।
- उनका जीवन संघर्ष युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत है।
- बुनाई को गुमनाम कलाकारों को पहचान दिलाने का प्रयास किया गया है।
पानीपत, 25 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। पिछले 60 वर्षों से पानीपत की हैंडलूम उद्योग को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले प्रख्यात बुनकर और हस्तशिल्प कलाकार खेमराज सुंदरियाल को भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। उत्तराखंड के मूल निवासी खेमराज ने अपनी कला, नवाचार और कड़ी मेहनत के माध्यम से पानीपत के हैंडलूम क्षेत्र को न केवल भारत में, बल्कि विश्व स्तर पर भी एक विशेष पहचान दिलाई है।
जामदानी कला, जो पारंपरिक रूप से मलमल पर होती है, खेमराज ने ऊन की शॉल पर प्रयोग करके एक नया आयाम दिया। यह नवाचार हैंडलूम उद्योग के लिए एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ। उनके इसी योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले हैं।
खेमराज ने केवल पारंपरिक डिजाइनों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने प्रसिद्ध चित्रकार एम.एफ. हुसैन की पेंटिंग्स को हूबहू टेपेस्ट्री में तैयार किया। ये कलाकृतियाँ इतनी जीवंत होती थीं कि पहचानना मुश्किल हो जाता था कि ये कागज पर हैं या कपड़े पर।
खेमराज वर्ष 1966 में बनारस से पानीपत आए थे। उस समय वे भारत सरकार के एक विभाग से जुड़े थे। पानीपत आकर उन्होंने पारंपरिक खेस बुनाई में नए प्रयोग किए और खेस को बेडशीट, बेड कवर और अन्य उत्पादों में बदलकर उद्योग को नया बाजार प्रदान किया।
उन्होंने टेपेस्ट्री (वॉल हैंगिंग) को इस तरह विकसित किया कि बड़े-बड़े कलाकारों की पेंटिंग्स को लूम पर वैसा ही तैयार किया जाता था जैसे वे कैनवास पर हों। यह काम पानीपत की हैंडलूम उद्योग के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।
खेमराज ने पानीपत उद्योग में पक्की रंगाई को बढ़ावा दिया। जब शुरुआत में लोग इसके लिए तैयार नहीं थे, तब उन्होंने प्रशिक्षण दिलवाया। आज स्थिति यह है कि पूरी पानीपत इंडस्ट्री पक्की रंगाई अपना चुकी है और गुणवत्ता में टॉप क्लास मानी जाती है।
उत्तराखंड के सुमाड़ी गांव में जन्मे खेमराज एक किसान परिवार से आते हैं। बुनाई का कोई पारिवारिक अनुभव नहीं था। पढ़ाई के दिनों में उन्हें रोज 6 किलोमीटर पैदल चलकर संस्थान जाना पड़ता था। समाज की उपेक्षा और तानों के बावजूद उन्होंने बुनाई को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
खेमराज का कहना है कि मोदी सरकार का यह प्रयास सराहनीय है कि वह उन लोगों को सम्मान दे रही है जो वर्षों तक गुमनाम रहे। अब पुरस्कारों के लिए सिफारिश नहीं, बल्कि काबिलियत देखी जाती है। खेमराज का मानना है कि यह सम्मान युवाओं को प्रेरित करेगा कि वे पारंपरिक कला और हैंडलूम को अपनाएं और ईमानदारी से मेहनत करें।
पिछले वर्ष पद्म श्री के लिए आवेदन करने वाले खेमराज को इस वर्ष फोन कॉल के माध्यम से सम्मान की जानकारी मिली। परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। उनकी पुत्रवधू ने कहा, “यह हमारे परिवार के लिए सपने जैसा पल है। पापा ने बहुत पहले जो कला अपनाई थी, आज उसे दुनिया पहचान रही है।”