क्या सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच को लेकर दायर याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा?
सारांश
Key Takeaways
- हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण है।
- सांप्रदायिक बयानबाजी पर नियंत्रण की आवश्यकता है।
- सभी पक्षकारों को लिखित दलीलें प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।
नई दिल्ली, 20 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच की घटनाओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली कई याचिकाओं पर मंगलवार को निर्णय सुरक्षित रख लिया। हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता ने इस मामले में सभी पक्षकारों से लिखित दलीलें प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि क्या सांप्रदायिक आधार पर होने वाली भड़काऊ बयानबाजी पर नियंत्रण के लिए कोई दिशानिर्देश निर्धारित किया जाए या कोई व्यवस्था बनाई जाए। 2018 में दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए दिशानिर्देश तय किए थे। याचिकाओं में इस आदेश का उचित तरीके से पालन न होने और भड़काऊ बयानबाजी पर रोक लगाने के लिए कोर्ट की हस्तक्षेप की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान वकील निजाम पाशा ने कहा कि शिकायतों के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं होतीं। यदि एफआईआर दर्ज होती है, तो सही धाराएं नहीं लगाई जातीं। हल्की धाराएं जैसे शरारत लगाई जाती हैं। ऐसे ही लोग राज्यों में फिर से ऐसे भाषण देते दिखते हैं। जब व्यक्तियों की पहचान हो जाती है तो राज्य कार्रवाई करने में क्यों नाकाम हो रहा है? हेट स्पीच से ही हेट क्राइम होते हैं।
एडवोकेट एमआर शमशाद ने कहा कि सामान्य हेट स्पीच के अलावा, एक ट्रेंड है कि वे केवल धार्मिक हस्तियों को लक्ष्य बनाते हैं। जब हम शिकायत दर्ज कराते हैं तो एफआईआर केवल इसलिए दर्ज नहीं होती क्योंकि मंजूरी की आवश्यकता होती है।
हिंदू सेना के वकील बरुण सिन्हा ने कहा कि ओवैसी और स्टालिन ने हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ सांप्रदायिक बयान दिए हैं। मैंने शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
एडवोकेट संजय हेगड़े ने कोर्ट को बताया कि एक न्यूज चैनल ने कहा था कि एक समुदाय का अपनी कम्युनिटी के लिए यूपीएससी की कोचिंग का इंतजाम करना 'यूपीएससी जिहाद' है। सुप्रीम कोर्ट ने कम से कम दो फैसले दिए हैं। समस्या यह है कि अक्सर एक व्यक्ति या एक संगठन जिसे अपनी बोलने की आजादी समझता है, वह दूसरे के लिए हेट स्पीच बन जाती है। यह किसी ऐसे व्यक्ति पर हमला करने का सवाल है जिसका सामाजिक स्तर कम है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने वकीलों को स्पष्टीकरण, सुझाव और तर्क आदि वाली अपनी बातें फाइल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। कोर्ट ने आदेश में कहा कि पक्षकार दो हफ्ते के अंदर अपने संक्षिप्त नोट्स फाइल कर सकते हैं।