क्या उत्तर प्रदेश ने मेडिकल क्षेत्र में एआई की मजबूत नींव रखी है?

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क्या उत्तर प्रदेश ने मेडिकल क्षेत्र में एआई की मजबूत नींव रखी है?

सारांश

उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके एक नई दिशा में अग्रसर है। सीएम योगी आदित्यनाथ की पहल से, प्रदेश में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का विकास हो रहा है, जो न केवल सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहे हैं, बल्कि ग्लोबल मॉडल के रूप में भी उभर रहे हैं।

Key Takeaways

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांति ला रहा है।
  • उत्तर प्रदेश ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का विकास किया है।
  • सीएम योगी आदित्यनाथ का दृष्टिकोण तकनीक को अपनाने का है।
  • प्रदेश में 10 लाख फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर कार्यरत हैं।
  • एआई आधारित क्लिनिकल डिसीजन कई मरीजों के लिए सहायक है।

लखनऊ, 11 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) स्वास्थ्य क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सहायक उपकरण के रूप में सामने आ रहा है, जो निर्णय लेने, रोग की पहचान और उपचार की गुणवत्ता को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है। सरकार ने अपनी कोशिशों से यह साबित कर दिया है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और फ्रंटलाइन वर्कर्स के समर्पण के माध्यम से एआई स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाया जा सकता है। आने वाले समय में समान पहुंच और अन्य राज्यों के साथ समन्वय के जरिए, उत्तर प्रदेश न केवल देश बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक एआई आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य नवाचार का उदाहरण बनेगा।

अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा अमित कुमार घोष के अनुसार, सीएम योगी आदित्यनाथ का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि तकनीक का उपयोग आम लोगों तक बेहतर, सुलभ और समयबद्ध स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए किया जाए। इस दिशा में पिछले पौने नौ वर्षों में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को भी प्राथमिकता दी गई है।

इसके परिणामस्वरूप, उत्तर प्रदेश देश के उन अग्रणी राज्यों में से एक बन गया है, जहां एआई आधारित स्वास्थ्य समाधानों को लागू करने की संभावनाएं सबसे अधिक हैं। प्रदेश में करीब 10 लाख फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर, आशा, एएनएम, नर्स और डॉक्टर ग्रामीण से लेकर शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ बने हैं। इनकी सहायता के लिए कई बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म सक्रिय हैं, जैसे हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (एचएमआईएस), रिप्रोडक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ (आरसीएच) पोर्टल, निक्षय पोर्टल (टीबी नियंत्रण के लिए) और ई-संजीवनी, जो अब केवल डेटा संग्रह तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नीति निर्माण, निगरानी और त्वरित निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यही डेटा एआई आधारित समाधानों का मजबूत आधार बनाता है।

अपर मुख्य सचिव ने बताया कि प्रदेश ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को स्वास्थ्य सुधार का केंद्रीय स्तंभ बनाया है और ई-संजीवनी के माध्यम से टेलीमेडिसिन नेटवर्क का व्यापक विस्तार हुआ है। आज उत्तर प्रदेश पूरे देश में सबसे अधिक टेलीकंसल्टेशन देने वाला राज्य बन चुका है। यही नेटवर्क अब एआई आधारित क्लिनिकल निर्णय को अपनाने की दिशा में अग्रसर है। वर्तमान में एआई आधारित क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (सीडीएसएस) प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और टेलीमेडिसिन सेवाओं में डॉक्टरों के लिए इलाज के निर्णय लेने में सहायता कर रहा है। यह सिस्टम मरीज के लक्षण, पूर्व इतिहास और उपलब्ध डेटा के आधार पर इलाज के विभिन्न विकल्प बताता है, जिससे न केवल उपचार की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है, बल्कि अधिक मरीजों वाले अस्पतालों में डॉक्टरों पर पड़ने वाला दबाव भी कम हो रहा है।

सीएम योगी का मानना है कि एआई डॉक्टर की जगह नहीं ले सकता, बल्कि उसे और सशक्त बनाता है। इसी सोच के तहत प्रदेश में एआई को सहायक उपकरण के रूप में अपनाया जा रहा है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की महानिदेशक डॉ. पिंकी जोवल ने बताया कि प्रदेश में टीबी से पीड़ित मरीजों की संख्या ठीक-ठाक है। इसे देखते हुए योगी सरकार ने टीबी उन्मूलन को सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखा है। निक्षय पोर्टल के साथ एआई आधारित विश्लेषणात्मक टूल्स को जोड़कर उन क्षेत्रों और मरीज समूहों की पहचान की जा रही है, जहां जोखिम अधिक है। मैपिंग और प्रारंभिक चेतावनी डॉक्टरों को यह अनुमान लगाने में मदद कर रही है कि कहां अतिरिक्त संसाधनों और गहन निगरानी की आवश्यकता है। इससे केस सामने आने से पहले ही पहचान संभव हो रही है, जो सीएम योगी के "रोकथाम ही सबसे बेहतर इलाज है" के दृष्टिकोण को मजबूती देती है। इसके साथ ही योगी सरकार का मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करना प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।

एआई आधारित उपकरण उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान, समय पर रेफरल और नवजात देखभाल में सहायता कर रहे हैं। वहीं, फ्रंटलाइन वर्कर्स को सरल डिजिटल संकेत मिलते हैं, जिससे वे समय रहते आवश्यक कदम उठा रही हैं। प्रदेश में गैर-संचारी रोग, विशेषकर डायबिटीज और उच्च रक्तचाप के मामले बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, देश में लगभग 6.5 प्रतिशत व्यस्क मधुमेह से ग्रस्त हैं। प्रदेश में एआई सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग और शुरुआती पहचान को सशक्त बना रहा है।

डायबिटिक रेटिनोपैथी की पहचान के लिए रेटिनल इमेज विश्लेषण जैसे पायलट प्रोजेक्ट्स ने यह सिद्ध किया है कि एआई से स्क्रीनिंग की पहुंच बढ़ाई जा सकती है और रेफरल सिस्टम को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। प्रदेश में अपनाया जा रहा एआई मॉडल पूरी तरह मानव-केंद्रित है, जिसमें आशा, एएनएम, नर्स और डॉक्टरों के अनुभव को केंद्र में रखकर तकनीक विकसित की जा रही है। प्रारंभिक पायलट प्रोजेक्ट से यह स्पष्ट हुआ है कि जब एआई समाधान जमीनी जरूरतों के अनुरूप होते हैं, तो उन्हें सहजता से अपनाया जाता है।

इससे प्रदेश में शोध संस्थानों, तकनीकी कंपनियों और डोनर एजेंसियों के बीच सहयोग से नवाचार को गति मिल रही है। योगी सरकार प्रदेश को एआई के क्षेत्र में एक मॉडल स्टेट के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है, जिससे देश के दूसरे प्रदेश भी सीख ले सकें।

Point of View

यह राज्य न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक मॉडल स्टेट बनने की दिशा में अग्रसर है। यह कदम अन्य प्रदेशों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगा।
NationPress
11/01/2026

Frequently Asked Questions

उत्तर प्रदेश में एआई का उपयोग कैसे किया जा रहा है?
उत्तर प्रदेश में एआई का उपयोग क्लिनिकल निर्णय समर्थन प्रणाली और स्वास्थ्य सेवाओं में किया जा रहा है, जिससे रोग की पहचान और उपचार की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है।
सीएम योगी आदित्यनाथ का दृष्टिकोण क्या है?
सीएम योगी आदित्यनाथ का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि तकनीक का उपयोग आम लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए किया जाए।
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