क्या वंदे मातरम विवाद में कांग्रेस और ममता बनर्जी की देशभक्ति महज दिखावा है?

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क्या वंदे मातरम विवाद में कांग्रेस और ममता बनर्जी की देशभक्ति महज दिखावा है?

सारांश

अमित मालवीय ने कांग्रेस और ममता बनर्जी की देशभक्ति पर सवाल उठाया है, कहकर कि यह महज एक राजनीतिक दिखावा है। संसद में नियमों के पालन को लेकर उनकी आपत्ति को उन्होंने 'राजनीतिक नौटंकी' बताया है। जानें इस विवाद की सच्चाई और इसके पीछे की राजनीति के बारे में।

Key Takeaways

  • संसद में वंदे मातरम का पाठ नियमों के तहत नहीं है।
  • राजनीतिक दलों की देशभक्ति पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
  • ममता बनर्जी के राजनीतिक दृष्टिकोण में बदलाव दिख रहा है।
  • भाजपा की रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
  • कांग्रेस की राजनीतिक चालें सुर्खियों में हैं।

नई दिल्ली, 29 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। भाजपा के आईटी सेल अध्यक्ष अमित मालवीय ने कांग्रेस और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर जोरदार हमला किया है। उन्होंने कहा कि संसद में हाल ही में दिए गए सुझाव पर दोनों दलों की जो आपत्ति है, वह पूरी तरह से 'राजनीतिक नौटंकी' है। यह नियम दशकों से अस्तित्व में है और इसे किसी सरकार ने नहीं, बल्कि संसद के प्रिसाइडिंग ऑफिसर्स ने तैयार किया था।

मालवीय ने अपने 'एक्स' पोस्ट में उल्लेख किया कि यदि यह स्थिति इतनी स्पष्ट रूप से दिखावटी नहीं होती, तो कांग्रेस और ममता बनर्जी का वंदे मातरम के प्रति अचानक प्रेम हास्यास्पद होता। यही कांग्रेस है जिसने 1935 में 'वंदे मातरम' को सांप्रदायिक तुष्टीकरण के लिए छोटा कर दिया था और अब देशभक्ति का ढोंग कर रही है। ममता बनर्जी अपने मुस्लिम वोट बैंक को नाराज करने के डर से 'वंदे मातरम' या 'भारत माता की जय' नहीं कहतीं और अब कैमरों के सामने आक्रोश दिखा रही हैं।

मालवीय ने कहा कि सच्चाई यह है कि संसद ने दशकों से शिष्टाचार के स्थिर और गैर-राजनीतिक नियमों का पालन किया है, जिन्हें संविधान सभा, लोकसभा और राज्यसभा के पीठासीन अधिकारियों ने खुद से निर्धारित किया है। उन्होंने बताया कि संसदीय बुलेटिन नियमित होते हैं, राजनीतिक नहीं। हर सत्र से पहले राज्यसभा सचिवालय संसदीय बुलेटिन जारी करता है, जिसमें सदस्यों को संसदीय रीति-रिवाजों और प्रथाओं की जानकारी दी जाती है।

अमित मालवीय ने बताया कि नियमों की शुरुआत संविधान सभा में हुई थी, जब एक सदस्य बार-बार 'थैंक यू' बोल रहे थे। उस पर अध्यक्ष ने कहा था, 'नो थैंक यू, नो जय हिंद, नो वंदे मातरम, नथिंग ऑफ काइंड।' इस प्रकार सदन के भीतर किसी भी नारे या संबोधन को स्वीकार नहीं किया गया है।

उन्होंने बताया कि चीन के आक्रमण पर बहस के दौरान जब एक सदस्य ने 'बोलो भारत माता की जय' कहा, तब स्पीकर ने टोका, 'यह कोई सार्वजनिक रैली नहीं है। संसद में ऐसे नारे नहीं लगते।' ये नियम कौल और शकधर जैसे संसदीय प्रक्रिया के आधिकारिक ग्रंथ में दर्ज हैं। 2003 से 2006 तक 'जय हिंद' और 'वंदे मातरम' का स्पष्ट उल्लेख था। 2007-2021 तक संक्षिप्त रूप में 'नो स्लोगन' लिखा जाता रहा। 2021 से फिर पूरा टेक्स्ट प्रकाशित हो रहा है।

मालवीय ने बताया कि 24 नवंबर 2025 के विंटर सेशन के लिए जारी बुलेटिन में भी वही पुरानी सलाह दोहराई गई है कि सदन के भीतर कोई नारा नहीं लगाया जाए।

उन्होंने कहा कि यह सरकार का आदेश नहीं है, न ही यह राष्ट्रीय गीत पर कोई पाबंदी है, बल्कि यह सिर्फ संसदीय मर्यादा बनाए रखने का नियम है जैसा संविधान सभा के नेताओं ने तय किया था। अमित मालवीय ने कहा कि असल मुद्दा नियम नहीं, बल्कि कांग्रेस और ममता बनर्जी की राजनीतिक चाल है।

उन्होंने सवाल उठाया कि कांग्रेस, जिसने 'वंदे मातरम' को वर्षों तक नकारा, आज अचानक राष्ट्रभक्ति की क्यों बात कर रही है? ममता बनर्जी ने अपना पूरा राजनीतिक जीवन राष्ट्रवादी नारों से दूर रहकर किसी एक समुदाय को नाराज न करने की कोशिश की और अब प्रतिबंधों को लेकर चिंता जता रही हैं? यह वंदे मातरम के प्रति प्रेम नहीं, बस राजनीतिक नाटक है।

Point of View

NationPress
29/11/2025

Frequently Asked Questions

क्या वंदे मातरम का पाठ संसद में करना आवश्यक है?
नहीं, संसद में वंदे मातरम या किसी भी नारे का पाठ करना आवश्यक नहीं है। यह केवल संसद की शिष्टाचार के नियमों के अंतर्गत आता है।
क्या यह विवाद राजनीतिक है?
हां, यह विवाद राजनीतिक है क्योंकि इसमें विभिन्न दलों की राजनीतिक रणनीतियां और उनके दृष्टिकोण शामिल हैं।
क्यों ममता बनर्जी वंदे मातरम पर प्रतिक्रिया कर रही हैं?
ममता बनर्जी अपने मुस्लिम वोट बैंक को नाराज करने से बचने के लिए वंदे मातरम पर प्रतिक्रिया कर रही हैं।
क्या अमित मालवीय का बयान सही है?
अमित मालवीय का बयान उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, लेकिन यह वास्तविकता पर निर्भर करता है कि क्या यह निष्पक्ष है।
क्या कांग्रेस ने वंदे मातरम को नकारा है?
हां, कांग्रेस ने अतीत में वंदे मातरम को सांप्रदायिक तुष्टीकरण के लिए छोटा किया था, जिसके लिए उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा है।
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