6 अक्टूबर 2026
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DRDO का स्वदेशी पैराशूट लद्दाख में 16,000 फीट से सफल, आत्मनिर्भर भारत को बड़ी उपलब्धि

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DRDO का स्वदेशी पैराशूट लद्दाख में 16,000 फीट से सफल, आत्मनिर्भर भारत को बड़ी उपलब्धि

सारांश

16,000 फीट की ऊंचाई, लद्दाख का चुनौतीपूर्ण इलाका और पूरी तरह स्वदेशी तकनीक — DRDO के नए उन्नत पैराशूट ने न्योमा में अपनी पहली वास्तविक छलांग में परीक्षा पास कर ली। यह भारत की उच्च-ऊंचाई सैन्य क्षमता और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की दिशा में एक ठोस कदम है।

मुख्य बातें

DRDO के स्वदेशी उन्नत उच्च-ऊंचाई पैराशूट ने 6 अक्टूबर 2026 को लद्दाख के न्योमा मुध ड्रॉप ज़ोन में पहला सफल वास्तविक परीक्षण किया।
सैनिक ने 16,000 फीट से छलांग लगाई, 15,500 फीट पर पैराशूट खुला और 13,700 फीट पर सुरक्षित लैंडिंग हुई।
पैराशूट को 18,000 फीट तक की ऊंचाई पर उपयोग के लिए डिज़ाइन किया गया है; स्थिर डोरी से बड़ी संख्या में पैराट्रूपर्स एक साथ उतर सकते हैं।
डिज़ाइन ( ADRDE, आगरा ), निर्माण ( आयुध पैराशूट कारखाना, कानपुर ), जाँच और प्रमाणन — संपूर्ण प्रक्रिया स्वदेशी।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम बताते हुए DRDO और सशस्त्र बलों को बधाई दी।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 6 अक्टूबर 2026 को लद्दाख के न्योमा स्थित मुध ड्रॉप ज़ोन में अपने स्वदेशी उन्नत उच्च-ऊंचाई पैराशूट का पहला वास्तविक परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न किया। भारतीय सैनिक ने 16,000 फीट की ऊंचाई से छलांग लगाई, 15,500 फीट पर पैराशूट खोला गया और 13,700 फीट की ऊंचाई पर सुरक्षित लैंडिंग के साथ यह परीक्षण सफल घोषित हुआ।

परीक्षण का विवरण और महत्व

न्योमा का मुध ड्रॉप ज़ोन देश के सबसे ऊंचाई वाले पैराशूट छलांग क्षेत्रों में गिना जाता है, जहाँ अत्यंत विरल वायुमंडल और प्रतिकूल मौसम की परिस्थितियाँ सामान्य पैराशूट परीक्षणों को जटिल बना देती हैं। रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह परीक्षण महज एक तकनीकी छलांग नहीं, बल्कि स्वदेशी उपकरण की वास्तविक परिस्थितियों में क्षमता की पुष्टि था।

गौरतलब है कि बहुत ऊंचाई पर पैराशूट से छलांग लगाना समतल इलाकों की सामान्य छलांग से बिल्कुल अलग होता है। पैराशूट खुलते समय लगने वाला तीव्र झटका और नीचे आने की गति सैनिक के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न कर सकती है। ऊंचाई पर वायु घनत्व कम होने के कारण यह जोखिम और भी बढ़ जाता है।

पैराशूट की तकनीकी विशेषताएँ

इस उन्नत पैराशूट प्रणाली को DRDO की आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ADRDE) ने डिज़ाइन किया है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार इसे 18,000 फीट तक की ऊंचाई पर उपयोग के लिए विकसित किया गया है। इसमें स्थिर डोरी की सहायता से बड़ी संख्या में पैराट्रूपर्स को एक साथ उतारने की क्षमता है।

पैराशूट खोलने के एकाधिक तरीके इसमें उपलब्ध हैं और नीचे उतरने की गति को सुरक्षित सीमा के भीतर रखने के लिए विशेष अभियांत्रिकी का उपयोग किया गया है। इसका निर्माण कानपुर स्थित आयुध पैराशूट कारखाने ने किया है।

गुणवत्ता जाँच और प्रमाणन

इस पैराशूट की गुणवत्ता की जाँच वैमानिकी गुणवत्ता आश्वासन महानिदेशालय ने की, जबकि विमानन गुणवत्ता आश्वासन केंद्र, कानपुर ने इसे प्रमाणित किया। यानी डिज़ाइन से लेकर निर्माण, जाँच और प्रमाणन तक की संपूर्ण प्रक्रिया पूरी तरह स्वदेशी रक्षा तकनीकी क्षमता पर आधारित है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत रक्षा आयात कम करने और निर्यात बढ़ाने के लिए व्यापक नीतिगत बदलाव कर रहा है।

सरकार और अधिकारियों की प्रतिक्रिया

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल परीक्षण पर DRDO, सशस्त्र बलों, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और उद्योग जगत को बधाई दी। उन्होंने इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक और बड़ा कदम बताया। रक्षा सचिव और DRDO अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने भी इस प्रणाली को विकसित करने वाली टीम को बधाई दी।

सामरिक महत्व और आगे की राह

यह उपलब्धि भारत की उन उच्च-ऊंचाई सैन्य क्षमताओं को सुदृढ़ करती है जो लद्दाख जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस परीक्षण की सफलता के बाद बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती में इस पैराशूट के उपयोग का मार्ग प्रशस्त होता है, जिससे भारतीय सेना की त्वरित-तैनाती क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी अभी बाकी है — एकल परीक्षण से बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती तक का रास्ता लंबा होता है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में उच्च-ऊंचाई तैनाती क्षमता को तेज़ी से बढ़ा रहा है, और आयातित उपकरणों पर निर्भरता कम करना रणनीतिक प्राथमिकता है। हालाँकि, DRDO की अनेक परियोजनाओं में प्रारंभिक सफलता से व्यापक परिनियोजन तक की यात्रा में विलंब की ऐतिहासिक प्रवृत्ति रही है। उद्योग विशेषज्ञों और रक्षा विश्लेषकों की नज़रें अब इस पैराशूट के बड़े पैमाने पर उत्पादन की समय-सीमा और सेना में आधिकारिक शामिल होने की तारीख पर टिकी होंगी।
RashtraPress
6 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

DRDO का नया स्वदेशी उच्च-ऊंचाई पैराशूट क्या है?
यह DRDO की आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ADRDE) द्वारा विकसित एक उन्नत पैराशूट प्रणाली है, जिसे 18,000 फीट तक की ऊंचाई पर सैनिकों को उतारने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसका निर्माण कानपुर के आयुध पैराशूट कारखाने ने किया है और संपूर्ण प्रक्रिया पूरी तरह स्वदेशी है।
लद्दाख में यह परीक्षण कहाँ और कैसे हुआ?
परीक्षण 6 अक्टूबर 2026 को लद्दाख के न्योमा स्थित मुध ड्रॉप ज़ोन में हुआ, जो देश के सबसे ऊंचाई वाले पैराशूट छलांग क्षेत्रों में से एक है। सैनिक ने 16,000 फीट से छलांग लगाई, 15,500 फीट पर पैराशूट खोला और 13,700 फीट पर सुरक्षित लैंडिंग की।
इस पैराशूट की क्या खास विशेषताएँ हैं?
रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह पैराशूट 18,000 फीट तक की ऊंचाई पर उपयोग योग्य है और स्थिर डोरी की मदद से बड़ी संख्या में पैराट्रूपर्स को एक साथ उतार सकता है। इसमें पैराशूट खोलने के एकाधिक तरीके हैं और सुरक्षित अवरोहण गति सुनिश्चित करने की विशेष व्यवस्था है।
इस परीक्षण का सामरिक महत्व क्यों है?
लद्दाख जैसे अत्यंत ऊंचाई वाले संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में त्वरित सैन्य तैनाती के लिए उच्च-ऊंचाई पैराशूट क्षमता अत्यावश्यक है। यह परीक्षण भारत की आयातित उपकरणों पर निर्भरता कम करने और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की नीति को व्यावहारिक आधार देता है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस पर क्या कहा?
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस पहली वास्तविक छलांग की सफलता पर DRDO, सशस्त्र बलों, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और उद्योग जगत को बधाई दी। उन्होंने इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक और बड़ा कदम बताया।
राष्ट्र प्रेस
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