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क्या गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला श्रद्धा, मनोरंजन और रोजगार का संगम है?

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क्या गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला श्रद्धा, मनोरंजन और रोजगार का संगम है?

सारांश

गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला हर साल मकर संक्रांति पर श्रद्धा, मनोरंजन और रोजगार का संगम प्रस्तुत करता है। यह प्राचीन परंपरा न केवल श्रद्धालुओं को जोड़ती है, बल्कि समाज में समरसता और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा देती है।

मुख्य बातें

गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला हर साल मकर संक्रांति पर आयोजित होता है।
यह मेले श्रद्धा , मनोरंजन और रोजगार का अद्भुत संगम है।
इसकी परंपरा त्रेतायुग से चली आ रही है।
यहाँ सभी धर्मों के लोग एक साथ आते हैं, जो सामाजिक समरसता का प्रतीक है।
मेला श्रद्धालुओं के लिए विभिन्न मनोरंजन और खरीदारी के अवसर प्रदान करता है।

गोरखपुर, 6 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। मकर संक्रांति के अवसर पर गोरखनाथ मंदिर में आयोजित होने वाला खिचड़ी मेला एक अद्वितीय श्रद्धा, मनोरंजन और रोजगार का मिश्रण है। सूर्यदेव के उत्तरायण होने पर महायोगी गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की यह परंपरा पूरी तरह लोक के प्रति समर्पित है।

गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी के रूप में अन्न का दान सालभर जरूरतमंदों को किया जाता है। यहाँ अन्न क्षेत्र में आने वाले सभी जरूरतमंदों को कभी भी खाली हाथ नहीं लौटना पड़ता। जैसे, बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाकर मन्नत मांगने वाले कभी निराश नहीं होते। इस वर्ष खिचड़ी का पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा।

गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा त्रेतायुगीन मानी जाती है। मान्यता है कि उस समय आदियोगी गुरु गोरखनाथ हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के मां ज्वाला देवी के दरबार में गए थे, जहाँ मां ने उनके लिए भोजन की व्यवस्था की। बाबा ने कहा कि वह तो योगी हैं और भिक्षा में मिली चीजों को ही ग्रहण करते हैं।

गुरु ने मां ज्वाला देवी से पानी गर्म करने का अनुरोध किया और भिक्षाटन के लिए निकल पड़े। भिक्षा मांगते-मांगते वह गोरखपुर आ पहुंचे और राप्ती और रोहिन के तट पर साधना करने लगे। मकर संक्रांति के पर्व पर यह परंपरा खिचड़ी पर्व में तब्दील हो गई। कहा जाता है कि ज्वाला देवी के दरबार में बाबा की खिचड़ी पकाने के लिए आज भी पानी उबल रहा है।

मकर संक्रांति के अवसर पर गोरक्षपीठाधीश्वर नाथ पंथ की विशेष परंपरा के अनुसार गुरु गोरखनाथ को लोक आस्था की खिचड़ी चढ़ाकर समस्त जनमानस की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल सहित विभिन्न क्षेत्रों से लाखों श्रद्धालु बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने आते हैं। मकर संक्रांति के दिन सबसे पहले गोरक्षपीठ की ओर से पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ खिचड़ी चढ़ाते हैं।

इसके बाद नेपाल राजपरिवार की ओर से खिचड़ी चढ़ाई जाती है। फिर मंदिर के कपाट खोल दिए जाते हैं और जनमानस की आस्था खिचड़ी के रूप में निवेदित होती है। खिचड़ी महापर्व को लेकर मंदिर और मेला परिसर सज-धजकर तैयार है। प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने श्रद्धालुओं के ठहरने और अन्य सुविधाओं का पूरा इंतजाम किया है। गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अब तक तीन बार खिचड़ी मेला की तैयारियों की समीक्षा की है।

गोरखनाथ मंदिर सामाजिक समरसता का ऐसा केंद्र है जहाँ जाति, पंथ और मजहब की दीवारें टूटती हैं। यहाँ सभी धर्मों के लोगों की दुकानें हैं। मंदिर परिसर में लगने वाला खिचड़ी मेला हजारों लोगों की आजीविका का साधन बनता है। यहाँ अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की भी बड़ी भागीदारी होती है, और उन्होंने कभी किसी प्रकार का भेदभाव महसूस नहीं किया है। मेले में खरीदारी और मनोरंजन के लिए भरपूर इंतजाम हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह समाज में समरसता और आर्थिक विकास को भी बढ़ावा देता है। यहां विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ आते हैं, जो सांस्कृतिक एकता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह मेला हमारी सामाजिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला कब मनाया जाता है?
गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला हर साल मकर संक्रांति के दिन मनाया जाता है।
इस मेले में कौन-कौन से लोग शामिल होते हैं?
इस मेले में लाखों श्रद्धालु, विभिन्न धर्मों के लोग और देश-विदेश से आगंतुक शामिल होते हैं।
खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा कब से चली आ रही है?
खिचड़ी चढ़ाने की यह परंपरा त्रेतायुग से मानी जाती है।
गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने के बाद क्या होता है?
खिचड़ी चढ़ाने के बाद जनसामान्य की आस्था को खिचड़ी के रूप में निवेदित किया जाता है।
इस मेले में क्या खास होता है?
इस मेले में मनोरंजन के साधनों, खरीदारी और सामाजिक समरसता के लिए कई आयोजन होते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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