क्या झारखंड में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति लंबित है? भाजपा ने राज्य सरकार पर सवाल उठाए
सारांश
Key Takeaways
- आरटीआई प्रणाली की स्थिति गंभीर है।
- बिना सूचना आयुक्तों के नागरिकों को जानकारी प्राप्त करना मुश्किल हो रहा है।
- सरकार को नियुक्तियों की प्रक्रिया में तेजी लानी चाहिए।
- भ्रष्टाचार के आरोपों के पीछे क्या कारण है?
- पारदर्शिता के लिए तात्कालिक कदम उठाने की जरूरत है।
रांची, 30 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। झारखंड में राज्य सूचना आयोग की निष्क्रियता पर भाजपा ने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। पार्टी ने कहा कि पिछले छह वर्षों से मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति लंबित है, जो सूचना का अधिकार कानून की सीधी अवहेलना है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस मुद्दे से जुड़े सवालों को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सरकार से जवाब मांगा है। पार्टी का कहना है कि आरटीआई कानून की धारा 12(3) और 15(3) में राज्य सूचना आयोग के गठन और रिक्त पदों को समय पर भरने का स्पष्ट प्रावधान है, ताकि सूचनाओं और अपीलों का निपटारा बाधित न हो, लेकिन राज्य में आयोग के रिक्त रहने से आरटीआई व्यवस्था लगभग ठप पड़ गई है और आवेदक महीनों से जानकारी के इंतज़ार में भटक रहे हैं।
झारखंड विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष मरांडी ने आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन की सरकार ने व्यवस्थित ढंग से राज्य को आरटीआई-फ्री जोन में बदल दिया है, जहां न प्रश्नों का जवाब मिल रहा है और न ही अपीलों की सुनवाई हो रही है। उन्होंने दावा किया कि हाईकोर्ट भी नियुक्तियों में देरी पर कई बार नाराजगी जता चुका है, लेकिन सरकार ने अब तक कोई पहल नहीं की है।
पार्टी का कहना है कि सूचनाओं के लंबित रहने, अपीलों पर सुनवाई न होने और आयोग के निष्क्रिय रहने से पारदर्शिता प्रभावित हुई है। भाजपा ने सवाल उठाया कि सरकार किस आशंका में नियुक्ति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा रही है और कौन-सा ऐसा भ्रष्टाचार है, जिसे उजागर होने से रोका जा रहा है।
भाजपा ने मांग की है कि राज्य सूचना आयोग की नियुक्तियां जल्द पूरी की जाएं और सूचना अधिकार व्यवस्था को फिर से सुचारू किया जाए। पार्टी ने कहा कि जनता पारदर्शिता चाहती है और सरकार को कानून के अनुरूप कार्रवाई करनी चाहिए।