ईरान के सामने अमेरिका को झुकना पड़ा: कासिम रसूल इलियास
सारांश
Key Takeaways
- सीजफायर का निर्णय समय पर लिया गया है।
- ईरान ने अमेरिका को झुकने पर मजबूर किया।
- पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण है।
- महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग जारी है।
- पश्चिम एशिया में शांति की संभावना बढ़ी है।
नई दिल्ली, 8 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता कासिम रसूल इलियास ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर के संबंध में कहा कि ईरान के समक्ष सुपरपावर अमेरिका को झुकना पड़ा। नई दिल्ली में राष्ट्र प्रेस से बातचीत के दौरान इलियास ने कहा कि सीजफायर का निर्णय बेहद सही समय पर लिया गया है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच की टकराव केवल इन तीन देशों को प्रभावित नहीं कर रहा था, बल्कि इससे समस्त पश्चिम एशिया और पूरी दुनिया पर प्रभाव पड़ रहा था, इसलिए अब राहत की सांस ली जा सकती है। निश्चित रूप से यह ईरान की विजय है। ईरान एक कमजोर देश था, जबकि उसके सामने एक सुपरपावर खड़ा था, लेकिन अंततः सुपरपावर को झुकना पड़ा। इजरायल अमेरिका के बिना कोई कदम नहीं उठा सकता। मूलतः इजरायल ने ही अमेरिका को इस युद्ध में खींचा है।
इलियास ने उल्लेख किया कि यह युद्ध ईरान पर थोपा गया था। यदि इस दृष्टिकोण से देखें तो अमेरिका अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो सका। सत्ता परिवर्तन की जो कोशिश की जा रही थी, वह सफल नहीं हुई, बल्कि ईरान और भी मजबूती से खड़ा हो गया। कच्चे तेल और गैस की कीमतें बढ़ रही थीं। चीजें भी नहीं मिल रही थीं। होर्मुज
उन्होंने कहा कि ये शर्तें बहुत उपयुक्त हैं। यह मामला केवल एक-दो दिन का नहीं है। इससे पहले भी 10 दिन की लड़ाई हो चुकी थी। अब भी यह युद्ध हुआ। ईरान चाहता है कि कोई अंतिम निर्णय लिया जाए कि इस तरह की लड़ाई नहीं होगी। दूसरी बात, जो न्यूक्लियर एनरिचमेंट हो रहा है, वह जारी रहेगा। यह शर्तों में भी शामिल है। तीसरी बात, भविष्य में होर्मुज से जो जहाज जाएंगे, वे नियमों का पालन करेंगे।
इलियास ने सीजफायर के संदर्भ में कहा कि इस संघर्ष में पाकिस्तान की भूमिका कितनी बढ़ गई है। आज जो बातचीत हो रही है, जिसमें अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बातचीत की मेज पर आए हैं, वह पाकिस्तान के प्रयासों का परिणाम है। शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर ने इस दिशा में प्रयास किए। भारत भी इस कार्य को कर सकता था, लेकिन भारत ने एक अवसर खो दिया।
महिला आरक्षण बिल पर उन्होंने कहा कि यह महिलाओं की एक पुरानी लंबित मांग है। जाहिर है कि लोकतंत्र में, यदि हम अपनी जनसंख्या का अनुपात देखें, तो लगभग 50 फीसदी महिलाएं हैं, इसलिए उनका कम से कम 50 फीसदी प्रतिनिधित्व संसद और विधानसभा में होना चाहिए। लेकिन, वर्तमान में जो बिल आया है, उसमें 33 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है, जो कम है। फिर भी, हम कह सकते हैं कि कुछ नहीं से बेहतर है कि उन्हें प्रतिनिधित्व मिले।