जब नारी अपनी शक्ति को पहचानती है, तब वह बनती है 'नारायणी': राज्यपाल आनंदीबेन पटेल
सारांश
Key Takeaways
- महिलाओं की शिक्षा और जागरूकता जरूरी है।
- नारी अपनी क्षमता पहचानकर 'नारायणी' बन सकती है।
- 'केजी टू पीजी' शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है।
- एचपीवी टीकाकरण से महिलाओं का स्वास्थ्य सुधार सकता है।
- विश्वविद्यालयों को सामाजिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
लखनऊ, 6 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि महिलाओं में शिक्षा और जागरूकता का विस्तार, बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी सामाजिक समस्याओं के समाधान का सबसे प्रभावी उपाय है। उन्होंने कहा कि जब नारी अपनी क्षमता को पहचान लेती है, तो वह समाज का नेतृत्व करने वाली ‘नारायणी’ बन जाती है।
प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन से शुक्रवार को जन भवन में प्रेस सूचना ब्यूरो के अधिकारियों की उपस्थिति में कर्नाटक और त्रिपुरा के 21 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने शिष्टाचार भेंट की। इस अवसर पर आयोजित संवाद कार्यक्रम में राज्यपाल ने शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपने अनुभव साझा किए।
राज्यपाल ने ‘केजी टू पीजी’ शिक्षा की अवधारणा पर जोर देते हुए कहा कि तीन वर्ष के सभी बच्चों का आंगनवाड़ी में और छह वर्ष
आनंदीबेन ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी कार्यान्वयन के साथ उच्च शिक्षा में 50 प्रतिशत नामांकन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समन्वित प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों ने नैक, एनआईआरएफ और क्यूएस रैंकिंग जैसे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मानकों पर उल्लेखनीय प्रगति की है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने बताया कि प्रदेश में बालिकाओं और महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर से बचाने के लिए एचपीवी टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। अब तक करीब 50 हजार बालिकाओं का टीकाकरण किया जा चुका है। साथ ही सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सहयोग से आकांक्षी जिलों में आदिवासी बेटियों के लिए एचपीवी वैक्सीन की तीन लाख निःशुल्क डोज उपलब्ध कराई जा रही हैं।
राज्यपाल ने विश्वविद्यालयों को सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि प्रदेश के विश्वविद्यालयों ने पांच-पांच गांव गोद लेकर स्वच्छता, वृक्षारोपण, जनजागरूकता और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े अभियान चलाए हैं। उन्होंने कहा कि सफलता के लिए निरंतर परिश्रम, सीखने की प्रवृत्ति और दूसरों को सुनने की आदत बेहद जरूरी है। विश्वविद्यालयों को ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए, जहां छात्र-छात्राओं की समस्याओं को सुना जाए और उनका समाधान किया जाए।