क्या शंकराचार्य का पहला पाठ अनुशासन है, जबकि अविमुक्तेश्वरानंद खुद विवाद खड़ा कर रहे हैं?
सारांश
Key Takeaways
- धर्मगुरु का पहला पाठ अनुशासन होना चाहिए।
- शंकराचार्य का कार्य व्यवस्था का समर्थन करना है।
- विवादों से दूर रहना धर्म का अनिवार्य हिस्सा है।
- सरकार को ऐसे विवादों पर ध्यान देना चाहिए।
- धर्म के प्रति लोगों का विश्वास बनाए रखना आवश्यक है।
पटना, 23 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। मातृ उद्बोधन आश्रम के निदेशक सत्येंद्र जी महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को गलत ठहराते हुए कहा है कि धर्मगुरु का सबसे पहला पाठ अनुशासन है। शंकराचार्य का एक अद्वितीय स्थान है। जो व्यवस्था स्थापित की गई है, उसमें सहयोग करना और धर्म के अनुसार उसे आगे बढ़ाना ही शंकराचार्य का कर्तव्य होना चाहिए। लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद इस दिशा में कार्य नहीं कर रहे हैं।
सत्येंद्र जी महाराज ने समाचार एजेंसी राष्ट्र प्रेस से बातचीत में कहा, "शंकराचार्य का महत्व और पद की गरिमा, उनके व्यवहार से मेल नहीं खाती। आदि गुरु शंकराचार्य ने धर्म की स्थापना और उसके प्रचार-प्रसार के लिए चारों मठों में शंकराचार्यों को नियुक्त किया था। तीन अन्य शंकराचार्य कभी विवादों में नहीं पड़ते। वे खुद को झगड़ों में नहीं फंसाते। लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद लगातार विवादों में पड़ते हैं।"
उन्होंने आरोप लगाया कि अविमुक्तेश्वरानंद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के एजेंट बनकर कार्य कर रहे हैं। अविमुक्तेश्वरानंद ने स्वयं ही यह विवाद खड़ा किया। उन्होंने सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती दी और फिर यह दावा किया कि प्रशासन ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया।
सत्येंद्र जी महाराज ने कहा, "कोई अन्य शंकराचार्य माघ मेले में नहीं गया, केवल अविमुक्तेश्वरानंद ही क्यों वहां पहुंचे? वहां जाकर उन्होंने पालकी से जाने की जिद की। यह अनुशासन नहीं है, यह अनुशासनहीनता है। वे कैसे संत कहलाने के योग्य हैं?"
अविमुक्तेश्वरानंद को स्वयंभू शंकराचार्य बताते हुए सत्येंद्र जी महाराज ने कहा कि सरकार यह मुद्दा नहीं उठा रही है, वह स्वयं ही विवाद को जन्म दे रहे हैं। अगर ऐसे खुद को शंकराचार्य कहने वाले लोग इस प्रकार की गड़बड़ी करते हैं और व्यवस्थाओं का साथ नहीं देते हैं, तो यह स्वाभाविक है कि सरकार कार्रवाई करेगी।
बता दें कि 17 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रयागराज मेघा मेला में संगम घाट पर स्नान करने पहुंचे थे। पूरे लाव-लश्कर के साथ वह अपनी पालकी पर आए थे, लेकिन पुलिस प्रशासन ने उन्हें बिना रथ के आगे बढ़ने को कहा। इसी बात पर अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला व्यवस्था में जुटे कर्मचारियों के बीच विवाद हुआ। बाद में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन पर आरोप लगाया कि उनके साथ यह व्यवहार जानबूझकर किया गया है। विवाद उस समय और बढ़ा, जब अविमुक्तेश्वरानंद माघ मेले में धरने पर बैठ गए।