ग्रेट निकोबार परियोजना: हिंद-प्रशांत में भारत की समुद्री शक्ति और रणनीतिक पहुँच होगी मजबूत
सारांश
Key Takeaways
भारत सरकार की ओर से जारी एक आधिकारिक फैक्टशीट के अनुसार, ग्रेट निकोबार परियोजना हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री उपस्थिति और रणनीतिक पहुँच को निर्णायक रूप से मजबूत करेगी। 1 मई 2025 को जारी इस फैक्टशीट में बताया गया कि यह परियोजना ग्रेट निकोबार द्वीप की भू-रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाते हुए अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की उपस्थिति को सशक्त बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई है।
परियोजना में क्या शामिल है
सरकार के अनुसार, इस सामरिक पहल के अंतर्गत चार प्रमुख घटक शामिल हैं — इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप एवं सुनियोजित नगरीय विकास, और पावर प्लांट। फैक्टशीट में कहा गया कि यह परियोजना बंदरगाह-आधारित विकास, पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और स्थानीय मूल समुदायों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है।
चरणबद्ध कार्यान्वयन
ग्रेट निकोबार परियोजना को तीन चरणों में लागू किया जा रहा है। चरण I (2025–35) में 72.12 वर्ग किमी, चरण II (2036–41) में 45.27 वर्ग किमी, और चरण III (2042–47) में 48.71 वर्ग किमी क्षेत्र को विकसित किया जाएगा। परियोजना का कुल क्षेत्रफल 166.10 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें 35.35 वर्ग किमी राजस्व भूमि और 130.75 वर्ग किमी वन भूमि सम्मिलित है। सरकार का कहना है कि यह चरणबद्ध दृष्टिकोण प्रत्येक चरण में पर्यावरणीय और जनजातीय कल्याण उपायों को प्रभावी ढंग से एकीकृत करने की सुविधा देता है।
पर्यावरण संरक्षण के उपाय
फैक्टशीट के अनुसार, इस परियोजना के लिए अंडमान और निकोबार द्वीपों के कुल वन क्षेत्र का मात्र 1.82 प्रतिशत हिस्सा उपयोग में लाया जाएगा। चिन्हित क्षेत्र में वृक्षों की अनुमानित संख्या 18.65 लाख है, किंतु अधिकतम 7.11 लाख वृक्ष ही काटे जाने की संभावना है, जो 49.86 वर्ग किमी वन क्षेत्र में विस्तृत हैं। वृक्षों की यह कटाई एक साथ न होकर चरणबद्ध तरीके से की जाएगी। पर्यावरणीय संतुलन के लिए 65.99 वर्ग किमी क्षेत्र को 'ग्रीन जोन' के रूप में संरक्षित रखा जाएगा, जहाँ एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा।
वनीकरण और क्षतिपूर्ति
चूँकि द्वीपों पर पहले से ही 75 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र उपलब्ध है, इसलिए वन क्षेत्र की क्षतिपूर्ति हरियाणा में की जा रही है। प्रथम चरण के 48.65 वर्ग किमी वन डायवर्जन के बदले हरियाणा में 97.30 वर्ग किमी भूमि को वनीकरण हेतु चिन्हित किया गया है। इसके अतिरिक्त, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान के अंतर्गत अब तक 24 लाख पौधे रोपे जा चुके हैं। सरकार का कहना है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और सभी कानूनी स्वीकृतियों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है।
सामरिक और आर्थिक महत्व
फैक्टशीट में रेखांकित किया गया है कि यह परियोजना हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में ग्रेट निकोबार को एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करेगी। गौरतलब है कि ग्रेट निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जो वैश्विक समुद्री व्यापार के सबसे व्यस्त मार्गों में से एक है। यह परियोजना सामरिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के संयोजन के माध्यम से राष्ट्रहित को पूर्णतः अनुरूप विकास सुनिश्चित करने का दावा करती है। आने वाले वर्षों में यह देखना होगा कि क्रियान्वयन के दौरान पर्यावरण और जनजातीय संरक्षण के वादे किस हद तक पूरे होते हैं।