क्या 'नील बट्टे सन्नाटा' से लेकर 'आई एम कलाम' तक, शिक्षा का असली अर्थ समझाती हैं फिल्में?
सारांश
Key Takeaways
- शिक्षा हर बच्चे का मूल अधिकार है।
- बॉलीवुड ने शिक्षा के महत्व को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- फिल्में बच्चों में सीखने की ललक जगाती हैं।
- समाज में बदलाव लाने की ताकत रखती हैं।
- शिक्षा राष्ट्र के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मुंबई, २४ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। शिक्षा समाज की एक मजबूत नींव है, जो राष्ट्र के विकास की दिशा को निर्धारित करती है। बच्चे ही देश का भविष्य हैं और शिक्षा वह साधन है, जो उन्हें एक उज्जवल कल की ओर ले जाती है। यह किसी विशेष वर्ग का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर बच्चे का मूल अधिकार है। शिक्षा के महत्व को रेखांकित करने में बॉलीवुड ने भी अपनी भूमिका निभाई है।
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस के अवसर पर ऐसी प्रेरणादायक फिल्मों पर चर्चा करना आवश्यक है, जो शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाती हैं। ये फिल्में न केवल ज्ञान के महत्व को दर्शाती हैं, बल्कि बच्चों और विद्यार्थियों के मन में सीखने की ललक और आगे बढ़ने का आत्मविश्वास भी जगाती हैं।
पहली फिल्म है आमिर खान की 'तारे ज़मीन पर'। यह फिल्म ना केवल शिक्षा प्रणाली को चुनौती देती है, बल्कि सीखने का नया तरीका भी सिखाती है। फिल्म में ईशान नाम का एक लड़का है, जिसके माता-पिता उसकी पढ़ाई के कमजोर प्रदर्शन के कारण उसे बोर्डिंग स्कूल भेज देते हैं, जहां उसकी मुलाकात आमिर खान से होती है, जो बच्चे के मानसिक विकार को पहचानते हैं और माता-पिता तथा बच्चे दोनों का मार्गदर्शन करते हैं। यह फिल्म बच्चे और माता-पिता के रिश्ते को भी उजागर करती है।
दूसरी फिल्म है 'नील बट्टे सन्नाटा'। स्वरा भास्कर की इस कॉमेडी-ड्रामा फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर अच्छा रिस्पांस मिला था और इसे वैश्विक स्तर पर 'द न्यू क्लासमेट' के नाम से भी रिलीज किया गया था। यह फिल्म एक मां-बेटी की कहानी है, जहां मां अपनी बेटी को पढ़ाने के लिए खुद स्कूल में दाखिला ले लेती है।
तीसरी फिल्म है 'चॉक एंड डस्टर'। इस फिल्म में शबाना आज़मी और जूही चावला मुख्य भूमिकाओं में हैं और यह शिक्षकों और छात्रों के बीच के खास रिश्ते को प्रदर्शित करती है।
शाहिद कपूर अभिनीत फिल्म 'पाठशाला' आज की शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई को प्रभावी ढंग से दर्शाती है। फिल्म में शाहिद कपूर एक शिक्षक की भूमिका में हैं और इसमें निजी स्कूलों के व्यवसायीकरण की समस्याओं को उठाया गया है।
साल २०११ में आई फिल्म 'आई एम कलाम' शिक्षा के क्षेत्र की एक अनोखी फिल्म है। इसमें किसी बड़े स्टार को नहीं लिया गया है, लेकिन इसकी कहानी एक गरीब राजस्थानी बच्चे की है, जो डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से प्रेरित होकर शिक्षा के मार्ग पर निकल पड़ता है। इसके अलावा 'फालतू', 'चल चलें', 'आरक्षण', '12वीं फेल', 'कोटा फैक्ट्री' और 'थ्री इडियट्स' जैसी फिल्में भी शिक्षा को महत्व देती हैं और समाज को बदलने की ताकत रखती हैं।