केदार शर्मा की 'लकी चवन्नी' का किंवदंती: जिस कलाकार को मिला उनका इनाम, वह बना सितारा

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केदार शर्मा की 'लकी चवन्नी' का किंवदंती: जिस कलाकार को मिला उनका इनाम, वह बना सितारा

सारांश

केदार शर्मा की 'चवन्नी' सिर्फ एक सिक्का नहीं था — यह हिंदी सिनेमा का सबसे शुभकारी तोहफा था। जिसे भी यह मिला, वह सितारा बन गया। राज कपूर से मधुबाला तक, शर्मा की नज़र और उदारता ने सिनेमा के भविष्य को बदल दिया।

Key Takeaways

  • केदार शर्मा (12 अप्रैल 1910 – 29 अप्रैल 1999) हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्म निर्माता-निर्देशक थे।
  • 1936 में 'देवदास' के लिए संवाद-लेखन से उन्हें इंडस्ट्री में पहचान मिली।
  • उन्होंने राज कपूर, मधुबाला (13 वर्ष की आयु में), गीता बाली और रोशन जैसी प्रतिभाओं को आगे बढ़ाया।
  • शर्मा की 'चवन्नी' (सिक्का) इनाम इंडस्ट्री में भाग्य-सूचक माना जाता था।
  • उन्होंने 'चित्रलेखा', 'नील कमल', 'बावरे नैन' जैसी कालजयी फिल्मों का निर्माण किया।
  • राज कपूर पुरस्कार मिलने से एक दिन पहले उनका निधन हो गया।

मुंबई, 28 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्म निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा अपने कठोर स्वभाव, उत्कृष्ट फिल्मों और नई प्रतिभा की पहचान करने की असाधारण क्षमता के लिए जाने जाते थे। लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में उनके बारे में एक और बात उतनी ही प्रसिद्ध थी — जब वह किसी कलाकार के प्रदर्शन से संतुष्ट होते थे, तो उसे दुअन्नी या चवन्नी (पुरानी मुद्रा) का इनाम दिया करते थे। उनकी यह छोटी सी मुद्रा कलाकारों के लिए किसी भाग्य-सूचक ताबीज़ से कम नहीं मानी जाती थी — और कहा जाता था कि जिसे भी शर्मा की चवन्नी मिल गई, वह आगे चलकर बड़ा नाम बन गया। इसी वजह से कई कलाकार उस चवन्नी को दशकों तक सँभालकर रखते थे।

संघर्ष से सफलता तक का सफर

12 अप्रैल 1910 को पंजाब के नरौला में जन्मे केदार शर्मा का बचपन कठिनाइयों में व्यतीत हुआ। कला, कविता और सिनेमा में उनकी जन्मजात रुचि थी, लेकिन उनके पिता चाहते थे कि वह पढ़-लिखकर शिक्षक बनें। सिनेमा का सपना देखने वाले किशोर केदार शर्मा ने घर छोड़ दिया और उस समय के फिल्म इंडस्ट्री के मुख्य केंद्र कोलकाता चले गए। वहाँ उन्हें शुरुआत में भीषण संघर्ष झेलना पड़ा — बड़े किरदारों की जगह उन्हें पोस्टर पेंटर के रूप में काम मिला, जहाँ उनकी चित्रकला की प्रतिभा काम आई। धीरे-धीरे वह फिल्म निर्माण के विभिन्न पहलुओं — कैमरा, छोटे अभिनय के रोल, कहानी-लेखन और संगीत-रचना — में दक्ष हो गए।

पहचान मिलने का मोड़

1936 में प्रदर्शित फिल्म 'देवदास' केदार शर्मा के जीवन का निर्णायक क्षण साबित हुई। इस क्लासिक के लिए उन्होंने संवाद और गीत लिखे, जिसने इंडस्ट्री में उन्हें मान्यता दिलाई। इसके बाद उन्होंने निर्देशन की ओर मुड़ा और 'चित्रलेखा', 'नील कमल', 'बावरे नैन' और 'जोगन' जैसी कालजयी फिल्मों का निर्माण किया। गौरतलब है कि शर्मा की फिल्मों में एक विशिष्ट सौंदर्य-बोध और गहराई थी, जो उन्हें समकालीन निर्देशकों से अलग करती थी।

प्रतिभा की पहचानकर्ता की विरासत

केदार शर्मा की सबसे बड़ी देन यह थी कि वह अपरिपक्व कलाकारों में छिपी प्रतिभा को तुरंत पहचान लेते थे। जब राज कपूर उनकी यूनिट में क्लैपर बॉय के रूप में काम करते थे, तब शायद ही किसी को अंदाज़ा था कि यह किशोर हिंदी सिनेमा का भविष्य शोमैन बनेगा। शर्मा ने 'नील कमल' में राज कपूर को हीरो की भूमिका दी — यह उनका पहला प्रमुख किरदार था। इसी फिल्म में उन्होंने मधुबाला को भी महत्वपूर्ण मौका दिया, जब वह मात्र 13 वर्ष की थीं। गीता बाली, भारत भूषण और संगीतकार रोशन जैसी कई अन्य प्रतिभाओं को भी शर्मा ने आगे बढ़ाया।

चवन्नी की किंवदंती

जब किसी कलाकार का प्रदर्शन शर्मा को मुग्ध करता था, तो वह उसे दुअन्नी या चवन्नी का इनाम दिया करते थे — एक सरल किंतु गहरे अर्थ वाली परंपरा। समय के साथ इंडस्ट्री में एक मिथ फैल गया कि केदार शर्मा की चवन्नी अत्यंत शुभकारी होती है। कई कलाकार इस सिक्के को अपने पास सुरक्षित रखते थे और विश्वास करते थे कि यह उनके सफल भविष्य का प्रतीक है। यह विश्वास निराधार नहीं था — जिन्हें शर्मा की चवन्नी मिली, उनमें से अधिकांश ने वाकई में सिनेमा में शीर्ष स्थान हासिल किया।

बाल सिनेमा में योगदान

व्यावसायिक फिल्मों के अलावा, शर्मा ने भारतीय बाल फिल्म सोसायटी के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी फिल्म 'जलदीप' को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला, जिससे भारतीय बाल सिनेमा को नई दिशा मिली। भारतीय सिनेमा में उनके कुल योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए, जिनमें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और महाराष्ट्र सरकार का राज कपूर पुरस्कार शामिल हैं।

अंतिम अध्याय

29 अप्रैल 1999 को केदार शर्मा का निधन हो गया। इतिहास की एक विडंबनापूर्ण बात यह है कि जिस राज कपूर अवॉर्ड से उन्हें सम्मानित किया जाना था, उसके प्रदान होने से मात्र एक दिन पहले उन्होंने दुनिया को विदा कर दिया। केदार शर्मा की विरासत आज भी हिंदी सिनेमा में जीवंत है — न केवल उनकी फिल्मों के माध्यम से, बल्कि उन सितारों के जरिए भी, जिन्हें उन्होंने पहचाना और संरक्षण दिया।

Point of View

लेकिन उनकी सूक्ष्म दृष्टि वास्तविक थी — राज कपूर और मधुबाला जैसे नाम इसका प्रमाण हैं। हालांकि, एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या शर्मा की सफलता केवल उनकी प्रतिभा-पहचान की क्षमता थी, या वह अपने समय के सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का भी लाभार्थी थे, जब सिनेमा अभी एक अलग माध्यम था। फिर भी, जो बात निर्विवाद है वह यह है कि शर्मा ने भारतीय सिनेमा को उसके सबसे महत्वपूर्ण अवतारों में से कुछ को दिया।
NationPress
28/04/2026

Frequently Asked Questions

केदार शर्मा कौन थे और वह किस लिए मशहूर थे?
केदार शर्मा (1910–1999) हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्म निर्माता-निर्देशक थे, जो नई प्रतिभा की पहचान करने और उत्कृष्ट फिल्मों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध थे। वह राज कपूर, मधुबाला और गीता बाली जैसे सितारों को आगे बढ़ाने के लिए जाने जाते हैं।
'लकी चवन्नी' की परंपरा क्या थी?
जब केदार शर्मा किसी कलाकार के प्रदर्शन से संतुष्ट होते थे, तो वह उसे दुअन्नी या चवन्नी (पुरानी मुद्रा) का इनाम दिया करते थे। इंडस्ट्री में यह माना जाता था कि शर्मा की चवन्नी अत्यंत शुभकारी होती है, और जिसे यह मिल गई, वह आगे चलकर सफल हो गया।
केदार शर्मा ने राज कपूर को किस तरह खोजा?
राज कपूर शर्मा की यूनिट में क्लैपर बॉय के रूप में काम करते थे। शर्मा ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें 'नील कमल' (1938) में हीरो की भूमिका दी, जो उनका पहला प्रमुख किरदार था और हिंदी सिनेमा का एक महत्वपूर्ण क्षण साबित हुआ।
केदार शर्मा की सबसे प्रसिद्ध फिल्में कौन-सी हैं?
केदार शर्मा की प्रसिद्ध फिल्मों में 'देवदास' (1936, संवाद-लेखन), 'चित्रलेखा', 'नील कमल' (1938), 'बावरे नैन' और 'जोगन' शामिल हैं। उन्होंने 'जलदीप' जैसी बाल फिल्मों के लिए भी काम किया, जिसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला।
केदार शर्मा को कौन-से पुरस्कार मिले?
केदार शर्मा को भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और महाराष्ट्र सरकार का राज कपूर पुरस्कार मिला। दुर्भाग्यवश, राज कपूर पुरस्कार के प्रदान होने से मात्र एक दिन पहले उनका निधन हो गया।
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