सिर्फ़ किताबें पढ़ने से अभिनय नहीं आता: शेखर सुमन का नई पीढ़ी को संदेश
सारांश
Key Takeaways
- शेखर सुमन ने कहा कि सिर्फ़ किताबें पढ़कर अभिनय नहीं सीखा जा सकता।
- अभिनय बोलने के तरीके, शारीरिक भाषा और आंतरिक व्यवहार का समन्वय है।
- नई पीढ़ी को व्यावहारिक प्रशिक्षण और गहन अभ्यास की आवश्यकता है।
- 1940 के दशक में फिल्मों में उर्दू का प्रभाव था और उच्चारण शुद्ध था।
- आजकल के कलाकार फिल्मों, साक्षात्कार और निजी बातचीत में गलत उच्चारण करते हैं।
- हर महान कलाकार की अपनी मौलिकता होती है, जो उसे दूसरों से अलग बनाती है।
मुंबई, 27 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय सिनेमा और टेलीविजन इंडस्ट्री के दिग्गज अभिनेता शेखर सुमन ने राष्ट्र प्रेस के साथ एक विस्तृत साक्षात्कार में आने वाली पीढ़ी के कलाकारों के लिए 'व्यावहारिक प्रशिक्षण' और अभिनय की बुनियादी समझ पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अभिनय केवल किताबों से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव और गहन प्रशिक्षण से सीखी जाने वाली कला है।
अभिनय सिर्फ़ कैमरे के सामने नहीं
शेखर सुमन ने साहिर लुधियानवी की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि एक सच्चे कलाकार के पास अनुभव और हुनर दोनों होते हैं। उन्होंने बताया कि समाज और दुनिया से जो कुछ भी सीखा जाता है, उसे आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाना अत्यंत आवश्यक है। अभिनेता ने कहा, "मुझे लगता है कि ये सही समय है, जब मैं आने वाली पीढ़ी को सही मार्ग दूँ।"
उन्होंने स्पष्ट किया कि अभिनय केवल कैमरे के सामने खड़े होने का काम नहीं है, बल्कि यह बोलने के तरीके, शारीरिक भाषा और आंतरिक व्यवहार का एक गहरा समन्वय है। हर महान कलाकार का अपना एक अलग अंदाज़ होता है, और यही मौलिकता एक कलाकार को दूसरों से अलग बनाती है।
व्यावहारिक प्रशिक्षण की अनिवार्यता
शेखर सुमन ने व्यावहारिक प्रशिक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया: "क्या आप सिर्फ़ किताब पढ़कर तैरना सीख सकते हैं? क्या आप पुस्तकों से हवाई जहाज़ उड़ाना सीख सकते हैं?" उन्होंने स्पष्ट किया कि ठीक यही नियम अभिनय पर भी लागू होता है। केवल किताबें पढ़कर अभिनय की कला में दक्षता हासिल नहीं की जा सकती।
अभिनेता ने कहा कि आज की नई पीढ़ी अक्सर भ्रमित रहती है और बहुत जल्दी सफलता पाना चाहती है। परंतु अभिनय एक ऐसी कला है जिसमें धैर्य, अनुभव और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है।
भाषा और उच्चारण में गिरावट की चिंता
शेखर सुमन ने भारतीय सिनेमा में भाषा के गिरते स्तर पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि 1940 के दशक से लेकर लंबे समय तक फिल्मों में उर्दू का प्रभाव था और अभिनेता एक खास लय और शुद्धता में संवाद बोलते थे। विविधता आई है, लेकिन उच्चारण की शुद्धता कहीं खो गई है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई अभिनेता हरियाणा के किरदार के लिए विशेष लहजा अपनाता है, तो वह समझदारी की बात है। परंतु एक सामान्य किरदार निभाते समय यदि शब्दों का उच्चारण गलत हो, तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। शेखर ने आगे कहा कि आजकल के कलाकार न केवल फिल्मों में, बल्कि साक्षात्कार और निजी बातचीत में भी गलत उच्चारण का प्रयोग करते हैं, जो उनकी व्यावसायिकता को प्रभावित करता है।
उद्योग में बदलाव और भविष्य की राह
गौरतलब है कि शेखर सुमन जैसे अनुभवी कलाकारों की सीख और मार्गदर्शन आने वाली पीढ़ी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने जोर दिया कि औपचारिक शिक्षा, व्यावहारिक अभ्यास, भाषागत शुद्धता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का समन्वय ही एक सफल अभिनेता को तैयार करता है। उनका संदेश स्पष्ट है: अभिनय एक जिम्मेदारी भरा पेशा है, जिसमें सिर्फ़ भाग्य या सुंदरता काफी नहीं है।