केवल किताबें पढ़ने से अभिनय नहीं आता: शेखर सुमन का सीधा संदेश नई पीढ़ी को
सारांश
Key Takeaways
- शेखर सुमन ने कहा कि अभिनय केवल किताबें पढ़कर नहीं, बल्कि व्यावहारिक प्रशिक्षण से सीखा जाता है।
- नई पीढ़ी के कलाकार अक्सर भ्रमित रहते हैं और तेज़ी से सफलता चाहते हैं, जो गलत दृष्टिकोण है।
- अभिनय बोलने के तरीके, व्यवहार और आंतरिक संवेदनशीलता का गहरा समन्वय है।
- हर महान कलाकार की अपनी मौलिकता होती है, जो उसे दूसरों से अलग करती है।
- भाषा की शुद्धता और सही उच्चारण आजकल के सिनेमा में खो गया है, जो चिंताजनक है।
मुंबई, 27 अप्रैल — भारतीय सिनेमा और टेलीविजन के दिग्गज अभिनेता शेखर सुमन ने राष्ट्र प्रेस के साथ एक विस्तृत साक्षात्कार में नई पीढ़ी के कलाकारों को सीधा संदेश दिया है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अभिनय केवल सैद्धांतिक ज्ञान से नहीं, बल्कि व्यावहारिक प्रशिक्षण और वास्तविक अनुभव से ही सीखा जा सकता है। इस बातचीत में सुमन ने भाषा के गिरते स्तर और कलात्मक मौलिकता के संकट पर भी गहरी चिंता व्यक्त की।
अभिनय सिर्फ सिद्धांत नहीं, व्यावहारिक कला है
शेखर सुमन ने साहिर लुधियानवी की पंक्तियों का हवाला देते हुए कहा कि एक सच्चे कलाकार के पास अनुभव और हुनर दोनों होते हैं। उन्होंने जोर दिया कि समाज और दुनिया से सीखी गई हर बात को आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाना अत्यंत आवश्यक है। 'यह सही समय है, जब मैं आने वाली पीढ़ी को सही मार्ग दूँ,' उन्होंने कहा। सुमन के अनुसार, अभिनय केवल कैमरे के सामने खड़े होने का काम नहीं है, बल्कि यह बोलने के तरीके, व्यवहार और आंतरिक संवेदनशीलता का एक गहरा समन्वय है।
नई पीढ़ी की जल्दबाज़ी और भ्रम
आज की युवा पीढ़ी के बारे में बात करते हुए, शेखर सुमन ने कहा कि नए कलाकार अक्सर भ्रमित रहते हैं और तेज़ी से सफलता पाना चाहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर महान कलाकार का अपना एक अलग अंदाज़ होता है, और यही मौलिकता ही किसी कलाकार को भीड़ से अलग करती है। सुमन के मुताबिक, नई पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि अभिनय एक सहज कला नहीं है, बल्कि इसमें वर्षों का अनुशासित प्रशिक्षण आवश्यक है।
किताबी ज्ञान से अभिनय नहीं सीखा जा सकता
सुमन ने किताबों पर निर्भरता की समस्या को लेकर एक सशक्त दृष्टांत दिया। उन्होंने पूछा कि 'क्या आप सिर्फ किताब पढ़कर तैरना या हवाई जहाज़ उड़ाना सीख सकते हैं?' उनका स्पष्ट उत्तर था — नहीं। ठीक यही नियम अभिनय पर भी लागू होता है। उन्होंने कहा कि एक व्यापक और व्यावहारिक अभिनय कोर्स की आवश्यकता है, जहाँ छात्रों को वास्तविक परिस्थितियों में काम करने का अनुभव मिले।
भाषा और उच्चारण की शुद्धता का संकट
शेखर सुमन ने भारतीय सिनेमा में भाषा के गिरते स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि 1940 के दशक से लेकर लंबे समय तक फिल्मों में उर्दू का प्रभाव था और अभिनेता एक विशेष लय में संवाद बोलते थे। 'आज विविधता तो आई है, लेकिन उच्चारण की शुद्धता कहीं खो गई है,' उन्होंने कहा। सुमन के अनुसार, यदि कोई अभिनेता हरियाणा के किरदार के लिए लहजा बदलता है, तो वह समझदारी भरा कदम है। लेकिन एक सामान्य किरदार में शब्दों का गलत उच्चारण स्वीकार्य नहीं है।
उन्होंने यह भी देखा कि आजकल के कलाकार न केवल फिल्मों में, बल्कि इंटरव्यूज़ और निजी बातचीत में भी गलत उच्चारण का इस्तेमाल करते हैं, जो एक गंभीर समस्या है। सुमन का मानना है कि भाषा की शुद्धता और स्पष्टता किसी भी कलाकार की पहचान का एक महत्वपूर्ण अंग होनी चाहिए।
आगे का रास्ता
शेखर सुमन की बातें उद्योग में एक महत्वपूर्ण संदेश देती हैं — अभिनय एक विरासत है, जिसे ज्ञान, अनुभव और अनुशासन के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उनके विचार नई पीढ़ी के लिए एक स्पष्ट दिशा निर्देश हैं कि कला को सीखने का कोई शॉर्टकट नहीं होता।