सुचित्रा सेन: करियर के शिखर पर रहने के बावजूद गुमनामी की राह चुनी, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार ठुकराया
सारांश
Key Takeaways
- सुचित्रा सेन का असली नाम रोमा दास गुप्ता था।
- उन्होंने दादा साहेब फाल्के पुरस्कार को ठुकराया।
- उनका करियर बंगाली फिल्मों से शुरू हुआ।
- उन्होंने उत्तम कुमार के साथ कई सफल फिल्में कीं।
- उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका चेहरा किसी को न दिखाया जाए।
नई दिल्ली, 5 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई सितारे आए हैं, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के साथ और भी चमकते हैं। सुचित्रा सेन ऐसा ही एक नाम हैं, जिनकी खूबसूरती और अदाकारी ने उन्हें दर्शकों के दिलों में स्थायी जगह दिला दी। लेकिन सुचित्रा सेन की जिंदगी केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रही; उनके जीवन में कई ऐसे महत्वपूर्ण फैसले थे, जिन्होंने उन्हें अन्य कलाकारों से अलग किया। इनमें से एक था दादा साहेब फाल्के पुरस्कार को ठुकराने का फैसला। यह कहानी उनके साधारण जीवन से शुरू होती है।
सुचित्रा सेन का जन्म 6 अप्रैल 1931 को बंगाल के एक छोटे से गांव में हुआ, जो आज बांग्लादेश में है। उनका असली नाम रोमा दास गुप्ता था। उनके पिता एक हेड मास्टर थे और मां गृहणी। कम उम्र में ही उनकी शादी दीबानाथ सेन से हो गई और एक साल बाद उन्होंने अपनी बेटी मुनमुन सेन को जन्म दिया। सुचित्रा का गाना और अभिनय में गहरी रुचि थी, और उनके पति ने उन्हें फिल्मों में आने के लिए प्रेरित किया। यहीं से उनके सपनों की उड़ान शुरू हुई।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बंगाली फिल्मों से की, लेकिन उनकी पहली फिल्म 'शेष कोथाय' रिलीज नहीं हो पाई। उनका डेब्यू हुआ 'चौत्तोर' फिल्म से, जिसमें उन्होंने उत्तम कुमार के साथ काम किया। इस जोड़ी ने पर्दे पर 20 वर्षों तक राज किया, और सुचित्रा ने अपने करियर में 61 में से 30 फिल्में उत्तम कुमार के साथ कीं।
हिंदी सिनेमा में भी सुचित्रा सेन ने 'मुसाफिर', 'देवदास', 'हॉस्पिटल', 'मुंबई का बाबू', 'ममता' और 'आंधी' जैसी फिल्मों में अपने अद्भुत अभिनय का लोहा मनवाया। उनके अभिनय की खासियत थी कि वे अपनी आंखों और भावनाओं से ही कहानी पेश कर देती थीं, जिससे दर्शक उनसे जुड़ जाते थे।
एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने बड़े-बड़े हीरो से भी ज्यादा फीस लेना शुरू कर दिया। लेकिन 1978 में उनकी फिल्म 'प्रणय पाशा' के असफल होने ने उन्हें अंदर से झकझोर दिया। इसके बाद उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री से दूरी बना ली और धीरे-धीरे समाज से भी खुद को अलग कर लिया।
यहां से उनकी जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हुआ। सुचित्रा सेन ने गुमनामी का रास्ता चुना और लगभग 36 वर्षों तक लोगों से दूर रहीं। उन्होंने सार्वजनिक स्थलों पर आना बंद कर दिया और अपना जीवन एकांत में बिताने लगीं। 2005 में, जब उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया, तो उन्होंने इसे लेने से मना कर दिया, क्योंकि वे सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आना चाहती थीं।
अंततः 17 जनवरी 2014 को सुचित्रा सेन का निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छा भी अनोखी थी; वे चाहती थीं कि उनके निधन के बाद उनका चेहरा किसी को न दिखाया जाए। उनके परिवार ने उनकी इस इच्छा का पूरा सम्मान किया।