क्या मन की उलझनें शरीर को बना सकती हैं लाचार? आयुर्वेद से जानिए समाधान
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली, 26 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में काम का दबाव, पैसों की चिंता, रिश्तों की खटास, भविष्य की अनिश्चितता और हमेशा कुछ बेहतर करने की होड़, ये सभी बातें धीरे-धीरे हमारे मन को थका देती हैं। पहले हमें लगता है कि यह केवल मानसिक परेशानी है, मगर जब तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो इसका असर शरीर पर साफ नजर आने लगता है।
सिरदर्द, नींद न आना, पेट खराब रहना, थकान, चिड़चिड़ापन और दिल की धड़कन तेज होना ये सब संकेत हैं कि मन की उलझनें अब शरीर को लाचार बना रही हैं।
आयुर्वेद का मानना है कि मन और शरीर अलग नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जब मन में असंतुलन होता है तो शरीर के दोष (वात, पित्त और कफ) भी बिगड़ने लगते हैं। निरंतर चिंता और डर से वात दोष बढ़ता है, जिससे घबराहट, अनिद्रा और जोड़ों में दर्द होता है।
गुस्सा और तनाव पित्त को बढ़ाते हैं, जिससे एसिडिटी, हाई ब्लड प्रेशर और त्वचा की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। वहीं उदासी और सुस्ती कफ को बढ़ाकर मोटापा, सुस्ती और कमजोर पाचन का कारण बनती हैं। इसलिए आयुर्वेद में उपचार की शुरुआत शरीर से नहीं, बल्कि मन को शांत करने से की जाती है।
मन को संतुलित रखने के लिए आयुर्वेद सबसे पहले दिनचर्या सुधारने पर जोर देता है। सुबह जल्दी उठना, सूरज की रोशनी में कुछ देर टहलना और दिन की शुरुआत गहरी सांसों के साथ करना मन को हल्का करता है। रोज 10-15 मिनट तिल या नारियल तेल से सिर और पैरों की मालिश करने से नर्वस सिस्टम शांत होता है और तनाव कम होता है। भोजन भी मन की स्थिति पर असर डालता है, इसलिए बहुत ज्यादा तीखा, तला-भुना और कैफीन से भरा खाना कम करना चाहिए। इसके बजाय हल्का, सादा और गर्म भोजन जैसे दाल, सब्जी, घी और दूध मन को स्थिर रखते हैं।
आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां भी तनाव से लड़ने में बहुत सहायक हैं। अश्वगंधा शरीर को मानसिक दबाव के अनुकूल बनाती है और थकान दूर करती है। ब्राह्मी और शंखपुष्पी याददाश्त सुधारने के साथ मन को शांत करती हैं। तुलसी और गिलोय की चाय रोज पीने से मन के साथ-साथ इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है। इसके अलावा योग और प्राणायाम जैसे अनुलोम-विलोम, भ्रामरी और शवासन मन को गहरी शांति देते हैं और बेचैनी को धीरे-धीरे कम करते हैं।