बलूच कार्यकर्ता ने इजरायली पीएम नेतन्याहू को पत्र लिखकर पाकिस्तान की भूमिका पर उठाए सवाल
सारांश
Key Takeaways
- मीर यार बलूच ने इजरायल के पीएम को पत्र लिखा।
- पाकिस्तान की एंटी-इजरायल बयानबाजी पर चिंता।
- पाकिस्तान के चरमपंथी संगठनों को पनाह देने के आरोप।
- जेएसएमएम ने पाकिस्तान की मध्यस्थता की आलोचना की।
- भारत की भूमिका पर जोर दिया गया।
क्वेटा, 10 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ता मीर यार बलूच ने शुक्रवार को इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को एक पत्र लिखकर पाकिस्तान से उत्पन्न हो रही “लगातार दुश्मनी और एंटी-इजरायल बयानबाजी” पर अपनी चिंता व्यक्त की।
उन्होंने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का हवाला दिया, जिन्होंने हाल ही में इजराइल को “बुराई” और “इंसानियत पर एक अभिशाप” कहा था और यहूदी राष्ट्र के संस्थापक के बारे में भी विवादास्पद टिप्पणी की थी। बाद में, अमेरिका-ईरान वार्ता से ठीक पहले, उन्होंने अपना यह पोस्ट हटा लिया।
मीर ने कहा, “इस तरह की भाषा केवल भड़काऊ नहीं है, बल्कि यह एक बड़े पैमाने पर चल रहे सरकारी समर्थन वाले चरमपंथ और क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने की सोच को दर्शाती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान की हाल की कोशिशें, जिनमें वह ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता करना चाहता है, वास्तव में शांति के लिए नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र में आतंक फैलाने के इरादे से हैं।
मीर ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान कई चरमपंथी संगठनों को पनाह देता है। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान ने पंजाब में हमास के नेताओं के लिए एक सार्वजनिक रैली आयोजित की। इससे स्पष्ट है कि पाकिस्तान हमास, हिज़्बुल्लाह, आईएसआईएस और अन्य चरमपंथी संगठनों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन चुका है। जब तक इस आतंक के अड्डे को समाप्त नहीं किया जाता, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति संभव नहीं है।”
उन्होंने कहा कि बलूचिस्तान के लोग शांति का हिस्सा बनना चाहते हैं, न कि संघर्ष का। उन्होंने कहा, “हम अपनी आज़ादी की पहचान चाहते हैं, साथ ही एक सुरक्षित, स्थिर और समृद्ध क्षेत्र बनाने में अपने योगदान देना चाहते हैं।”
इस बीच, जेएसएमएम (जिए सिंध मुत्ताहिदा महाज) के अध्यक्ष शफी बुरफत ने भी पाकिस्तान की कथित “मध्यस्थता कोशिशों” की आलोचना की और इसे क्षेत्र में “चरमपंथ और आतंकवाद का समर्थक” बताया।
उन्होंने कहा कि यदि क्षेत्र में कोई भी राजनीतिक, आर्थिक या रणनीतिक बातचीत भारत को शामिल किए बिना होती है, तो वह अधूरी और कमजोर मानी जाएगी।
bुरफत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर कहा, “भारत, मध्य पूर्व और ईरान इस क्षेत्र की बड़ी शक्तियाँ हैं। इनके बीच किसी भी राजनीतिक या आर्थिक प्रगति अगर भारत के बिना होती है, तो उसकी वैधता कम हो जाएगी। पाकिस्तान जैसे देश, जिसे लंबे समय से आतंकवाद का समर्थक माना जाता है, को शांति वार्ता का मेज़बान बनाना ऐसा है जैसे भेड़ियों को बकरियों की रखवाली करने देना।”
उन्होंने कहा, “यह स्थिति खतरनाक और चिंताजनक होगी। दुनिया को याद रखना चाहिए कि भारत इस क्षेत्र में एक बड़ी और ताकतवर भूमिका निभाता है। अगर भारत को ऐसे मामलों से अलग रखने की कोशिश की जाती है, तो यह शांति के खिलाफ होगा।”