क्या बांग्लादेश में इस्लामी लामबंदी का पुनरुत्थान चिंता का विषय है?

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क्या बांग्लादेश में इस्लामी लामबंदी का पुनरुत्थान चिंता का विषय है?

सारांश

बांग्लादेश में ‘तौहीदी जनता’ का उभार नई चिंताओं का कारण बन रहा है। यह आंदोलन नैतिकता के नाम पर जनवादी राजनीति के रूप में उभर रहा है, जबकि संस्थाएं कमजोर और व्यवस्था ढीली हो रही हैं। जानें इसके पीछे के कारण और इस्लामी राजनीति की वास्तविकता।

मुख्य बातें

‘तौहीदी जनता’ का उभार बांग्लादेश में नई चिंताओं को जन्म दे रहा है।
यह आंदोलन नैतिकता के नाम पर जनवादी राजनीति से जुड़ा है।
हसीना के हटने के बाद राजनीतिक शून्य उत्पन्न हुआ है।
यह कोई औपचारिक संगठन नहीं, बल्कि विभिन्न तत्वों का समूह है।
समर्थकों द्वारा हिंसा की घटनाएं भी सामने आई हैं।

कैनबरा, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। बांग्लादेश में ‘तौहीदी जनता’ नामक इस्लामी जनआंदोलन के पुनरुत्थान ने नई चिंताओं को जन्म दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह उभार संगठित उग्रवाद के रूप में नहीं, बल्कि नैतिकता के नाम पर दबाव बनाने वाली जनवादी राजनीति (कोर्सिव पॉपुलिज़्म) के रूप में उभर रहा है। यह उन स्थितियों में बढ़ता है जब संस्थाएं कमजोर होती हैं, कानून-व्यवस्था ढीली पड़ जाती है और राजनीतिक वैधता पर सवाल उठता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह लामबंदी खुलकर कार्य कर रही है और ‘गैर-इस्लामी’ मूल्यों को निशाना बनाना धार्मिक कर्तव्य के रूप में प्रस्तुत कर रही है। इसी कारण से यह तात्कालिक दमन से बचते हुए सार्वजनिक स्थानों और सामाजिक व्यवहार को नए सिरे से आकार देने में सफल हो रही है।

ऑस्ट्रेलिया में प्रकाशित पत्रिका द इंटरप्रेटर के मुताबिक, करीब 16 वर्षों तक शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार ने चुनावी प्रक्रिया, मजबूत सुरक्षा तंत्र और राज्य-समर्थित धर्मनिरपेक्ष “बंगाली राष्ट्रवाद” के सहारे शासन किया। इस दौरान इस्लामी दलों और धार्मिक नेटवर्कों को दबाया गया, अपने साथ मिलाया गया या विभाजित किया गया।

रिपोर्ट में कहा गया, “सार्वजनिक धार्मिक आचरण को तो सहन किया गया, लेकिन राज्य के नियंत्रण से बाहर राजनीतिक इस्लाम को सख्ती से प्रबंधित किया गया। इससे खुले टकराव सीमित रहे, लेकिन धार्मिक राजनीति समाप्त नहीं हुई; वह अनौपचारिक और राजनीति-विहीन क्षेत्रों में चली गई। अगस्त 2024 में हसीना के सत्ता से हटने के साथ ही यह व्यवस्था ढह गई, जिससे न केवल राजनीतिक शून्य उत्पन्न हुआ, बल्कि नैतिक अधिकार का भी संकट सामने आया।”

हसीना के हटने के बाद बने सत्ता-शून्य में, रिपोर्ट के अनुसार, ‘तौहीदी जनता’ उभर कर सामने आई, जिसने सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने के लिए धार्मिक कर्तव्य का आह्वान किया।

रिपोर्ट में बताया गया, “यह कोई औपचारिक संगठन नहीं है, बल्कि एक ऐसा लेबल है जिसके तहत विभिन्न तत्व एकत्र होते हैं। ये सार्वजनिक स्थानों में हस्तक्षेप करते हैं, व्यवहार पर पहरा लगाते हैं, सांस्कृतिक गतिविधियों में बाधा डालते हैं और महिलाओं से संबंधित आयोजनों को निशाना बनाते हैं। इसकी ताकत इसकी अस्पष्टता में है—बिना किसी नेतृत्व या औपचारिक ढांचे के यह भीड़, प्रतीकों और नैतिक दबाव के जरिए कार्य करता है, न कि संस्थागत मौजूदगी के माध्यम से।”

रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि ‘तौहीदी जनता’ के कथित समर्थकों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में प्रत्यक्ष हिंसा की घटनाएं भी सामने आई हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

मैं मानता हूं कि बांग्लादेश में ‘तौहीदी जनता’ का उभार एक गंभीर मुद्दा है। यह स्थिति न केवल राजनीतिक परिदृश्य को बदल सकती है, बल्कि समाज में धार्मिक ध्रुवीकरण भी बढ़ा सकती है। हमें इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है और समाज में सामंजस्य बनाए रखने के लिए कदम उठाने की जरूरत है।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

‘तौहीदी जनता’ क्या है?
‘तौहीदी जनता’ एक इस्लामी जनआंदोलन है जो नैतिकता के नाम पर जनवादी राजनीति का प्रदर्शन करता है।
इस्लामी लामबंदी का बांग्लादेश पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
यह लामबंदी सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकती है, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है।
क्या यह आंदोलन उग्रवाद की ओर ले जा सकता है?
हालांकि यह उभार उग्रवाद के रूप में नहीं दिखता, लेकिन इसकी गतिविधियों से उग्रवाद की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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