क्या पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं की हत्या असहिष्णुता की संस्कृति को दर्शाती है?
सारांश
Key Takeaways
- सिंध में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बढ़ रही है।
- ईशनिंदा के आरोपों से सांप्रदायिक तनाव पैदा हो रहा है।
- जबरन धर्म परिवर्तन और अपहरण की घटनाएं चिंताजनक हैं।
- सरकारी समर्थन की कमी से अल्पसंख्यकों की स्थिति और बिगड़ रही है।
- कानूनी शून्यता ने अपराधियों को प्रोत्साहित किया है।
काठमांडू, २४ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बड़ी संख्या में हिंदू अल्पसंख्यक बसते हैं। इस प्रांत में ईशनिंदा के आरोपों के चलते बार-बार सांप्रदायिक हिंसा के मामले सामने आते हैं। हाल ही में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ये हमले एक समान पैटर्न में होते हैं। इन हिंसक घटनाओं की शुरुआत एक आरोप से होती है, उसके बाद धार्मिक नेताओं द्वारा भीड़ इकट्ठा करने, सांप्रदायिक अशांति फैलाने और प्रभावित हिंदू समुदाय को बलात हटाने की प्रक्रिया शुरू होती है।
नेपाली मीडिया आउटलेट खबरहब की रिपोर्ट के अनुसार, "सिंध में हाल ही में एक हिंदू किसान की हत्या ने पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को एक बार फिर उजागर किया है। पीड़ित, कोल्ही समुदाय का किसान था। जमीन के उपयोग को लेकर उसके और एक प्रभावशाली स्थानीय जमींदार के बीच विवाद हुआ। विवाद के बाद पीड़ित किसान को दिनदहाड़े गोली मार दी गई। इस घटना के उपरांत पूरे सिंध में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। हिंदू समुदाय ने हाईवे जाम कर दिए और न्याय की मांग की।"
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "यह मामला केवल एक हत्या का नहीं था। यह सजा से छूट, सामंती ताकत और धार्मिक भेदभाव के गहरे पैटर्न को उजागर करता है। यह मामला पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं की वास्तविकता को दर्शाता है, जहां कई अल्पसंख्यक, विशेषकर हिंदू, तेजी से एक दुश्मनी भरी जगह में जी रहे हैं। यहाँ झूठे आरोप, जबरन धर्म परिवर्तन, अपहरण, पैसे का दवाब, और लक्षित हिंसा होती है।"
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में भी ऐसी ही हिंसा की घटनाएं हुई हैं, जबकि वहां हिंदुओं की संख्या बहुत कम है। लाहौर के सेंटर फॉर सोशल जस्टिस की एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से 2024 के बीच कम से कम 421 अल्पसंख्यक महिलाओं और लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया, जिनमें से 71% नाबालिग थीं और अधिकांश हिंदू और ईसाई समुदाय से थीं।
रिपोर्ट में कहा गया है, "शारीरिक हिंसा के अलावा, सिस्टमिक प्रताड़ना भी हिंदू नागरिकों की स्थिति को कमजोर करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। समय-समय पर, रिपोर्ट में कम उम्र की हिंदू लड़कियों के अपहरण, उन्हें इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर करने और मुस्लिम पुरुषों से विवाह कराने के मामलों का जिक्र है। यदि पीड़ित परिवार कानूनी उपाय करने का प्रयास करते हैं, तो उन्हें जान से मारने की धमकियों, सुनवाई में देरी और न्यायालय के फैसलों का सामना करना पड़ता है। अधिकांश न्यायालय के फैसले धर्म परिवर्तन करने वालों के पक्ष में होते हैं।"
इसमें आगे कहा गया है कि सार्वजनिक बहस और कानूनी प्रयासों के बावजूद जबरन धर्म परिवर्तन को अपराध मानने वाला कोई प्रभावी राष्ट्रीय कानून नहीं बनाया गया है। हिंदू परिवारों के पक्ष में कोई प्रभावी कानूनी उदाहरण मौजूद नहीं है। इस कानूनी शून्यता ने अपराधियों को प्रोत्साहित किया है और हिंदू माता-पिता के बीच डर का माहौल बनाया है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सरकारों का समर्थन न मिलने और कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों के प्रति बढ़ती सहानुभूति के कारण पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों के लिए स्थिति अब समानता की नहीं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम में जीवित रहने की बन गई है जो बार-बार उनकी सुरक्षा में असफल रहा है।