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22 जून 2016: इसरो ने PSLV-C34 से एक साथ 20 सैटेलाइट लॉन्च कर रचा था अंतरिक्ष इतिहास

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22 जून 2016: इसरो ने PSLV-C34 से एक साथ 20 सैटेलाइट लॉन्च कर रचा था अंतरिक्ष इतिहास

सारांश

22 जून 2016 को इसरो ने PSLV-C34 से एक ही उड़ान में 20 सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित कर भारत की बहु-उपग्रह प्रक्षेपण क्षमता साबित की। इसमें कार्टोसैट-2 के साथ छात्र-निर्मित उपग्रह और चार देशों के 17 विदेशी उपग्रह भी थे — जो 2017 के 104-सैटेलाइट विश्व रिकॉर्ड की नींव बनी।

मुख्य बातें

इसरो ने 22 जून 2016 को PSLV-C34 से एक ही मिशन में 20 सैटेलाइट सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किए।
प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 9:26 बजे हुआ; मुख्य उपग्रह 16 मिनट 30 सेकंड में कक्षा में पहुँचा।
मिशन की प्राथमिक पेलोड कार्टोसैट-2 श्रेणी का उपग्रह था, जिसका वजन 727.5 किलोग्राम था।
छात्र-निर्मित उपग्रह 'सत्यभामासैट' और 'स्वयं' भी मिशन में शामिल थे।
17 विदेशी सैटेलाइट — अमेरिका (13), कनाडा (2), जर्मनी (1), इंडोनेशिया (1) — भी प्रक्षेपित की गईं।
यह मिशन 2017 में 104 सैटेलाइट के विश्व रिकॉर्ड की पूर्वपीठिका साबित हुआ।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 22 जून 2016 को अंतरिक्ष विज्ञान में एक ऐतिहासिक अध्याय जोड़ा, जब PSLV-C34 रॉकेट ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से एक ही उड़ान में 20 सैटेलाइट सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किए। यह मिशन उस समय भारत की सबसे बड़ी बहु-उपग्रह प्रक्षेपण उपलब्धि थी और वैश्विक अंतरिक्ष बाज़ार में इसरो की विश्वसनीयता को नई ऊँचाई पर ले गई।

मिशन का घटनाक्रम

सुबह 9 बजकर 26 मिनट पर PSLV-C34 ने उड़ान भरी। प्रक्षेपण के लगभग 16 मिनट 30 सेकंड बाद मिशन की मुख्य सैटेलाइट — 727.5 किलोग्राम वजनी कार्टोसैट-2 श्रेणी का उपग्रह — अपनी निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हो गई। इसके बाद अगले कुछ मिनटों में शेष 19 सह-यात्री सैटेलाइट भी क्रमबद्ध रूप से अलग होकर अपनी-अपनी कक्षाओं में पहुँच गईं। रॉकेट के सभी चरण पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार सफलतापूर्वक पूरे हुए।

कार्टोसैट-2: मिशन की धुरी

मिशन की प्राथमिक पेलोड कार्टोसैट-2 श्रेणी की सैटेलाइट अत्याधुनिक हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरों से सुसज्जित थी। यह उपग्रह शहरी एवं ग्रामीण विकास योजनाओं, सड़क नेटवर्क निगरानी, जल संसाधन प्रबंधन, तटीय क्षेत्रों के अध्ययन, भूमि उपयोग मानचित्रण और भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) जैसे अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण डेटा प्रदान करने में सक्षम है। गौरतलब है कि कार्टोसैट श्रृंखला के उपग्रह भारत की भूमि प्रबंधन और रक्षा-संबंधी इमेजिंग ज़रूरतों में अहम भूमिका निभाते रहे हैं।

छात्र-निर्मित सैटेलाइट: युवा प्रतिभा को मंच

इस मिशन की एक विशेष उपलब्धि यह रही कि इसमें भारतीय विश्वविद्यालयों के छात्रों द्वारा निर्मित दो सैटेलाइट — 'सत्यभामासैट' और 'स्वयं' — भी शामिल थे। चेन्नई के सत्यभामा विश्वविद्यालय और पुणे के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने इन्हें तैयार किया था। यह ऐसे समय में आया जब इसरो युवा वैज्ञानिकों को राष्ट्रीय अंतरिक्ष कार्यक्रम से जोड़ने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहा था।

अंतरराष्ट्रीय भागीदारी

मिशन में भेजी गई 17 विदेशी सैटेलाइट चार देशों — अमेरिका (13), कनाडा (2), जर्मनी (1) और इंडोनेशिया (1) — की थीं। यह तथ्य इसरो की वाणिज्यिक प्रक्षेपण सेवाओं की वैश्विक माँग को रेखांकित करता है। आँकड़ों के अनुसार, इसरो ने इस दशक में दर्जनों विदेशी उपग्रहों को प्रक्षेपित कर विदेशी मुद्रा अर्जित की है, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक रही है।

ऐतिहासिक महत्व और आगे की राह

22 जून 2016 का यह मिशन इसरो के बहु-उपग्रह प्रक्षेपण की क्षमता का प्रारंभिक मील का पत्थर था। इसके बाद फरवरी 2017 में इसरो ने PSLV-C37 से एक ही उड़ान में 104 सैटेलाइट प्रक्षेपित कर विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया — जो 2016 की इस सफलता की नींव पर ही संभव हो सका। यह यात्रा स्पष्ट करती है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम क्रमिक तकनीकी उत्कर्ष की दिशा में निरंतर अग्रसर है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसने यह साबित किया कि भारत एकाधिक देशों के उपग्रह एक साथ, समय पर और किफ़ायती दरों पर कक्षा में स्थापित कर सकता है। अमेरिका जैसे तकनीकी महाशक्ति के 13 उपग्रहों का इस मिशन में शामिल होना यह रेखांकित करता है कि भरोसेमंदी ही इसरो का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धात्मक लाभ है। छात्र-निर्मित उपग्रहों को शामिल करने का निर्णय भी दूरदर्शी था — इसने अगली पीढ़ी के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों में राष्ट्रीय कार्यक्रम के प्रति स्वामित्व-भाव जगाया, जो आज गगनयान जैसे महत्वाकांक्षी मिशनों की मानव-पूँजी तैयार कर रहा है।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PSLV-C34 मिशन में कितने और किन देशों के सैटेलाइट भेजे गए थे?
PSLV-C34 मिशन में कुल 20 सैटेलाइट भेजे गए, जिनमें भारत का कार्टोसैट-2 और 2 छात्र-निर्मित उपग्रह शामिल थे। शेष 17 विदेशी सैटेलाइट अमेरिका (13), कनाडा (2), जर्मनी (1) और इंडोनेशिया (1) की थीं।
कार्टोसैट-2 सैटेलाइट का क्या उपयोग है?
कार्टोसैट-2 हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरों से लैस पृथ्वी अवलोकन उपग्रह है। इसका उपयोग शहरी-ग्रामीण विकास योजना, सड़क नेटवर्क निगरानी, जल संसाधन प्रबंधन, तटीय अध्ययन और GIS मानचित्रण जैसे कार्यों में होता है।
PSLV-C34 मिशन में छात्रों की क्या भूमिका थी?
मिशन में 'सत्यभामासैट' और 'स्वयं' नामक दो छात्र-निर्मित सैटेलाइट शामिल थे। इन्हें चेन्नई के सत्यभामा विश्वविद्यालय और पुणे के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने तैयार किया था।
22 जून 2016 का मिशन इसरो के इतिहास में क्यों महत्वपूर्ण है?
यह उस समय भारत का सबसे बड़ा बहु-उपग्रह प्रक्षेपण मिशन था। इसने इसरो की एक साथ अनेक उपग्रह तैनात करने की तकनीकी क्षमता को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया और 2017 में 104 सैटेलाइट के विश्व रिकॉर्ड की नींव रखी।
PSLV-C34 ने उड़ान कहाँ से और कब भरी थी?
PSLV-C34 ने 22 जून 2016 को सुबह 9 बजकर 26 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी। लगभग 16 मिनट 30 सेकंड बाद मुख्य उपग्रह कार्टोसैट-2 अपनी निर्धारित कक्षा में स्थापित हो गया।
राष्ट्र प्रेस
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