18 जुलाई 2026
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विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग: श्रीहरिकोटा से इतिहास रचने पर डॉ. जितेंद्र सिंह बोले — 'मोदी के साहसिक फैसले का परिणाम'

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विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग: श्रीहरिकोटा से इतिहास रचने पर डॉ. जितेंद्र सिंह बोले — 'मोदी के साहसिक फैसले का परिणाम'

सारांश

स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक उड़ा — और भारत के निजी अंतरिक्ष युग का पहला अध्याय लिखा गया। डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसे मोदी के स्पेस सुधारों की जीत बताया। केवल 5 वर्षों में हासिल यह उपलब्धि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की नई दावेदारी है।

मुख्य बातें

स्काईरूट एयरोस्पेस के रॉकेट विक्रम-1 ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से सफल ऑर्बिटल लॉन्च किया।
स्काईरूट श्रीहरिकोटा से ऑर्बिटल लॉन्च करने वाली भारत की पहली निजी कंपनी बनी।
केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ.
जितेंद्र सिंह ने इसे PM मोदी के स्पेस सेक्टर उदारीकरण के निर्णय का सीधा परिणाम बताया।
यह सफलता स्पेस सुधारों के मात्र 5 वर्षों के भीतर आई, जिसे मंत्री ने वैश्विक तुलना में बेहतर रिकॉर्ड बताया।
आईएन-स्पेस और इसरो की पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को इस मिशन का आधार बताया गया।

केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने 18 जुलाई 2026 को कहा कि स्काईरूट एयरोस्पेस के रॉकेट विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग भारत के लिए एक ऐतिहासिक गर्व का क्षण है — और यह उपलब्धि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस साहसिक निर्णय का प्रत्यक्ष परिणाम है, जिसके तहत देश के अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला गया था। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से ऑर्बिटल लॉन्च करने वाली स्काईरूट एयरोस्पेस भारत की पहली निजी कंपनी बन गई है।

ऐतिहासिक उपलब्धि: पहली निजी कंपनी, पहली सफलता

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, 'निश्चित रूप से यह हम सभी और पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है। पहली बार किसी निजी कंपनी ने अपनी योजना के अनुसार अपना रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च किया है।' उन्होंने रेखांकित किया कि यह केवल एक तकनीकी सफलता नहीं, बल्कि भारत के अंतरिक्ष सुधारों की व्यावहारिक पुष्टि है।

गौरतलब है कि यह वही सतीश धवन स्पेस सेंटर है जहाँ से इसरो ने दशकों तक अपने मिशन संचालित किए हैं। अब इसी परिसर से एक निजी उद्यम ने कक्षीय उड़ान भरकर भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के एक नए अध्याय की शुरुआत की है।

मोदी के स्पेस रिफॉर्म्स का परिणाम

मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह सफलता पाँच-छह वर्ष पूर्व लिए गए एक नीतिगत निर्णय की देन है। उन्होंने कहा, 'यह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि पाँच-छह साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साहसिक फैसला लेते हुए देश के स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया था।'

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर निजी अंतरिक्ष उद्योग तेज़ी से विस्तार पा रहा है और अमेरिका, यूरोप तथा चीन की निजी कंपनियाँ इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। भारत की यह उपलब्धि उसे उस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सशक्त रूप से स्थापित करती है।

पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की सराहना

डॉ. जितेंद्र सिंह ने मिशन से जुड़े सभी पक्षों को बधाई देते हुए कहा, 'इस शानदार पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को संभव बनाने के लिए आईएन-स्पेस को बधाई। इस सहयोग को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाने के लिए इसरो को बधाई। सबसे बढ़कर, इसे संभव बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हार्दिक आभार।'

उल्लेखनीय है कि आईएन-स्पेस (Indian National Space Promotion and Authorisation Centre) वह नियामक संस्था है जिसे स्पेस सेक्टर के उदारीकरण के बाद निजी कंपनियों को सुविधा और मंज़ूरी देने के लिए स्थापित किया गया था। स्काईरूट की यह सफलता उस ढाँचे की पहली बड़ी कसौटी थी।

वैश्विक तुलना में भारत का रिकॉर्ड

मंत्री ने दावा किया कि पहली ही कोशिश में सफल ऑर्बिटल लॉन्च का भारत का रिकॉर्ड उन देशों से बेहतर है जिन्होंने अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत से कई दशक पहले शुरू किए थे। उन्होंने कहा, 'पिछले केवल 5 वर्षों में जो उपलब्धियाँ हासिल हुई हैं, वे किसी चमत्कार से कम नहीं हैं। स्पेस सेक्टर के लिहाज़ से 5 साल बहुत लंबा समय नहीं होता। आज की यह उपलब्धि उसी शानदार रिकॉर्ड में एक और नया अध्याय जोड़ती है।'

भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए यह मील का पत्थर आने वाले वर्षों में और अधिक निजी प्रक्षेपण वाहनों और उपग्रह मिशनों की नींव रखता है। स्काईरूट एयरोस्पेस की यह उड़ान संकेत देती है कि भारत का वाणिज्यिक अंतरिक्ष बाज़ार अब केवल संभावना नहीं, एक ठोस वास्तविकता बन रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका राजनीतिक संदर्भ भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है — सरकार इसे स्पेस सुधारों की जीत के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जो स्वाभाविक है। असली कसौटी यह होगी कि क्या यह एकल सफलता एक टिकाऊ वाणिज्यिक पारिस्थितिकी तंत्र में बदल पाती है, या यह एक प्रतीकात्मक मील का पत्थर बनकर रह जाती है। भारत के स्पेस स्टार्टअप्स को अभी भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा, पूँजी की उपलब्धता और नियामकीय स्पष्टता की चुनौतियों का सामना करना है। नीतिगत उदारीकरण ज़रूरी था, पर पर्याप्त नहीं — अगला पड़ाव यह है कि क्या भारत दर्जनों निजी मिशनों की नींव रख सकता है, न कि केवल एक ऐतिहासिक पहली उड़ान की।
RashtraPress
18 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विक्रम-1 रॉकेट क्या है और इसे किसने लॉन्च किया?
विक्रम-1 स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा निर्मित एक ऑर्बिटल लॉन्च वाहन है, जिसे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। इस लॉन्च के साथ स्काईरूट एयरोस्पेस श्रीहरिकोटा से ऑर्बिटल मिशन संचालित करने वाली भारत की पहली निजी कंपनी बन गई।
विक्रम-1 की सफलता भारत के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की पहली सफल ऑर्बिटल लॉन्चिंग है, जो दर्शाती है कि स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोलने का नीतिगत निर्णय व्यावहारिक परिणाम दे रहा है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के अनुसार यह उपलब्धि मात्र 5 वर्षों में हासिल हुई है।
भारत ने स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए कब और क्यों खोला?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगभग पाँच-छह वर्ष पूर्व देश के अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने का निर्णय लिया था। इस सुधार के तहत आईएन-स्पेस की स्थापना की गई, जो निजी कंपनियों को अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए मंज़ूरी और सहायता प्रदान करती है।
आईएन-स्पेस की इस मिशन में क्या भूमिका रही?
आईएन-स्पेस (Indian National Space Promotion and Authorisation Centre) वह नियामक संस्था है जिसने स्काईरूट एयरोस्पेस को इस मिशन के लिए आवश्यक मंज़ूरी और सुविधाएँ प्रदान कीं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसरो और आईएन-स्पेस के बीच की पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को इस सफलता का आधार बताया।
विक्रम-1 की सफलता के बाद भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र का भविष्य कैसा है?
यह लॉन्च भारत के वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो आने वाले वर्षों में और अधिक निजी प्रक्षेपण मिशनों की संभावना को मज़बूत करता है। हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि एकल सफलता से टिकाऊ वाणिज्यिक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए निरंतर निवेश और नीतिगत समर्थन आवश्यक होगा।
राष्ट्र प्रेस
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