17 जुलाई 2026
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विक्रम-1 की 18 जुलाई को पहली टेस्ट फ्लाइट: स्काईरूट एयरोस्पेस रचेगी इतिहास, भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट उड़ान भरेगा

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विक्रम-1 की 18 जुलाई को पहली टेस्ट फ्लाइट: स्काईरूट एयरोस्पेस रचेगी इतिहास, भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट उड़ान भरेगा

सारांश

भारतीय अंतरिक्ष इतिहास में एक नया अध्याय लिखने की तैयारी है — 18 जुलाई को स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 श्रीहरिकोटा से उड़ान भरेगा। यह किसी भारतीय निजी कंपनी का पहला ऑर्बिटल रॉकेट प्रयास है, जो देश के बढ़ते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की परिपक्वता का प्रमाण है।

मुख्य बातें

स्काईरूट एयरोस्पेस 18 जुलाई को श्रीहरिकोटा के SDSC-SHAR से विक्रम-1 की पहली टेस्ट फ्लाइट का प्रयास करेगी।
यह भारत की किसी निजी कंपनी द्वारा पहली ऑर्बिटल श्रेणी की रॉकेट उड़ान होगी।
रॉकेट का लक्ष्य 60 डिग्री झुकाव के साथ 450 किलोमीटर की कक्षा तक पहुँचना है; LEO में 350 किग्रा तक पेलोड क्षमता।
मिशन का नाम ' आगमन ' है; पेलोड में ग्राहा स्पेस, कॉसमोसर्व, डीक्यूब्ड और SCOPE शामिल हैं।
विक्रम-1 कार्बन कॉम्पोजिट संरचना, 3D-प्रिंटेड इंजन और सॉलिड-फ्यूल बूस्टर से लैस है।
इससे पहले कंपनी ने 18 नवंबर 2022 को विक्रम-एस की सफल सब-ऑर्बिटल उड़ान पूरी की थी।

निजी अंतरिक्ष कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने 16 जुलाई 2025 को घोषणा की कि वह 18 जुलाई को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर (SDSC-SHAR) के पहले लॉन्च पैड से अपने विक्रम-1 ऑर्बिटल रॉकेट की पहली टेस्ट फ्लाइट का प्रयास करेगी। यह पहली बार होगा जब किसी भारतीय निजी कंपनी द्वारा पूर्णतः डिज़ाइन और विकसित किया गया ऑर्बिटल श्रेणी का रॉकेट भारतीय ज़मीन से अंतरिक्ष की ओर उड़ान भरेगा।

मिशन का विवरण और पेलोड

'मिशन आगमन' नाम का यह अभियान स्काईरूट का दूसरा मिशन है। विक्रम-1 अपने साथ कई टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन पेलोड ले जाएगा, जिनमें ग्राहा स्पेस, कॉसमोसर्व, डीक्यूब्ड और स्काईरूट के अपने SCOPE पेलोड शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, कॉसमोस डायमंड्स की कलाकृति 'कॉस्मिक ब्लूम' और एक माइक्रो-आर्ट पीस भी इस मिशन का हिस्सा होंगे।

कंपनी के अनुसार, संबंधित अधिकारियों ने लॉन्च के लिए आवश्यक एयरस्पेस और मैरिटाइम नोटिस जारी कर दिए हैं। विक्रम-1 के उड़ान मार्ग और संभावित प्रभाव क्षेत्र के आसपास के प्रतिबंधित क्षेत्रों को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया जा चुका है।

रॉकेट की तकनीकी विशेषताएँ

करीब सात मंजिला ऊँचाई वाला विक्रम-1 एक मल्टी-स्टेज रॉकेट है, जिसे पूरी तरह कार्बन कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से निर्मित किया गया है। इसमें कंपनी द्वारा स्वयं विकसित प्रोपल्शन सिस्टम का उपयोग किया गया है, जिसमें 3D-प्रिंटेड इंजन और उच्च क्षमता वाले सॉलिड-फ्यूल बूस्टर शामिल हैं।

इस पहली टेस्ट फ्लाइट का लक्ष्य 60 डिग्री झुकाव के साथ 450 किलोमीटर ऊँचाई की कक्षा तक पहुँचना है। विक्रम-1 को इस प्रकार डिज़ाइन किया गया है कि यह लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 350 किलोग्राम तक के छोटे सैटेलाइट स्थापित कर सके।

CEO का बयान और कंपनी का दृष्टिकोण

स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पवन कुमार चंदाना ने कहा कि विक्रम-1 की जमीनी स्तर पर हर संभव परीक्षण प्रक्रिया पूरी कर ली गई है और अब कंपनी पहली बार वास्तविक उड़ान के दौरान उसके प्रदर्शन को देखने के लिए उत्साहित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह एक टेस्ट फ्लाइट है और इससे कंपनी को कई महत्वपूर्ण तकनीकी आँकड़े प्राप्त होंगे।

चंदाना ने यह भी बताया कि छोटे सैटेलाइट लॉन्च का वैश्विक बाज़ार फिलहाल आपूर्ति की कमी से जूझ रहा है, जबकि अंतरिक्ष आधारित सेवाओं की माँग लगातार बढ़ रही है। उनके अनुसार, यह परिस्थिति स्काईरूट जैसी कंपनियों के लिए नए व्यावसायिक अवसर उत्पन्न कर रही है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि स्काईरूट एयरोस्पेस इससे पहले 18 नवंबर 2022 को विक्रम-एस की सफल सब-ऑर्बिटल उड़ान पूरी कर चुकी है, जो भारतीय धरती से अंतरिक्ष तक पहुँचने वाला पहला निजी रॉकेट बना था। यह ऐसे समय में आया है जब भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र तेज़ी से विकसित हो रहा है और सरकार ने भी इस क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है।

विक्रम-1 की सफल उड़ान भारत को उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल कर सकती है जहाँ निजी कंपनियाँ ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च करने में सक्षम हैं। आने वाले समय में इस मिशन से प्राप्त तकनीकी आँकड़े स्काईरूट के नियमित व्यावसायिक लॉन्च कार्यक्रम की नींव रखेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत के निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की असली अग्निपरीक्षा है। स्काईरूट का सफर 2022 की सब-ऑर्बिटल उड़ान से ऑर्बिटल प्रयास तक तेज़ रहा है, लेकिन ऑर्बिटल और सब-ऑर्बिटल के बीच तकनीकी खाई बेहद गहरी होती है — SpaceX और RocketLab जैसी कंपनियाँ भी पहले प्रयास में सफल नहीं हुई थीं। असली सवाल यह है कि विफलता की स्थिति में भी क्या भारत का निवेश और नीतिगत समर्थन इस क्षेत्र को गति देता रहेगा, या एक झटके में उत्साह ठंडा पड़ जाएगा। वैश्विक छोटे सैटेलाइट बाज़ार में भारत की हिस्सेदारी अभी नगण्य है — विक्रम-1 की सफलता उसे बदल सकती है।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विक्रम-1 रॉकेट क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
विक्रम-1 स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट है, जो लो अर्थ ऑर्बिट में 350 किलोग्राम तक के सैटेलाइट स्थापित करने में सक्षम है। यह पूरी तरह कार्बन कॉम्पोजिट संरचना, 3D-प्रिंटेड इंजन और सॉलिड-फ्यूल बूस्टर से बना है।
विक्रम-1 की टेस्ट फ्लाइट कब और कहाँ होगी?
विक्रम-1 की पहली टेस्ट फ्लाइट 18 जुलाई को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर (SDSC-SHAR) के पहले लॉन्च पैड से होगी। इस उड़ान का लक्ष्य 60 डिग्री झुकाव के साथ 450 किलोमीटर की कक्षा तक पहुँचना है।
मिशन आगमन में कौन-से पेलोड भेजे जा रहे हैं?
मिशन आगमन में ग्राहा स्पेस, कॉसमोसर्व, डीक्यूब्ड और स्काईरूट के SCOPE पेलोड शामिल हैं। इसके अलावा कॉसमोस डायमंड्स की कलाकृति 'कॉस्मिक ब्लूम' और एक माइक्रो-आर्ट पीस भी मिशन का हिस्सा हैं।
स्काईरूट एयरोस्पेस का इससे पहले का मिशन क्या था?
स्काईरूट एयरोस्पेस ने 18 नवंबर 2022 को विक्रम-एस की सफल सब-ऑर्बिटल उड़ान पूरी की थी, जो भारतीय धरती से अंतरिक्ष तक पहुँचने वाला पहला निजी रॉकेट बना था। विक्रम-1 कंपनी का दूसरा और पहला ऑर्बिटल मिशन है।
विक्रम-1 की सफलता से भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र पर क्या असर पड़ेगा?
सफल उड़ान की स्थिति में भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जहाँ निजी कंपनियाँ ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च करने में सक्षम हैं। यह वैश्विक छोटे सैटेलाइट बाज़ार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने और स्काईरूट के नियमित व्यावसायिक लॉन्च कार्यक्रम की नींव रखने में मददगार होगा।
राष्ट्र प्रेस
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