18 जुलाई 2026
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विक्रम-1 की ऐतिहासिक उड़ान: गौतम अदाणी बोले — 'यही है आत्मनिर्भर भारत का असली प्रमाण'

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विक्रम-1 की ऐतिहासिक उड़ान: गौतम अदाणी बोले — 'यही है आत्मनिर्भर भारत का असली प्रमाण'

सारांश

विक्रम-1 की पहली ऑर्बिटल उड़ान ने इतिहास रच दिया — भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा देश बना जहाँ किसी निजी कंपनी ने रॉकेट को कक्षा में पहुँचाया। औसतन 28 वर्ष की उम्र वाली टीम की यह उपलब्धि भारत के निजी स्पेस सेक्टर के नए युग का संकेत है।

मुख्य बातें

स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 ने 18 जुलाई 2026 को 'मिशन आगमन' के तहत अपनी पहली ऑर्बिटल उड़ान में सभी उद्देश्य सफलतापूर्वक पूरे किए।
रॉकेट पृथ्वी की निचली कक्षा में लगभग 450 किलोमीटर की ऊँचाई तक पहुँचा; यह चार-चरणीय वाहन करीब सात मंजिला ऊँचा है।
भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा देश बना जहाँ किसी निजी कंपनी ने ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता प्रदर्शित की।
गौतम अदाणी ने एक्स पर पोस्ट कर टीम को बधाई दी और इसे 'आत्मनिर्भर भारत का असली प्रमाण' बताया।
स्काईरूट टीम की औसत आयु मात्र 28 वर्ष ; मिशन को इसरो और आईएन-स्पेस का सहयोग मिला।

स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट ने 18 जुलाई 2026 को अपनी पहली ऑर्बिटल उड़ान में मिशन के सभी उद्देश्य सफलतापूर्वक पूरे किए, जिससे भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया जहाँ किसी निजी कंपनी ने रॉकेट को कक्षा में स्थापित करने की क्षमता का सफल प्रदर्शन किया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर अदाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदाणी ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए इसे 'आत्मनिर्भर भारत' की भावना का सच्चा उदाहरण बताया।

मिशन आगमन: क्या हासिल हुआ

हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस ने 'मिशन आगमन' के अंतर्गत विक्रम-1 का प्रक्षेपण किया। करीब सात मंजिला ऊँचा यह चार-चरणीय लॉन्च व्हीकल पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में लगभग 450 किलोमीटर की ऊँचाई तक पहुँचा। यह रॉकेट छोटे उपग्रहों के लिए त्वरित और माँग-आधारित लॉन्च सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।

गौरतलब है कि विक्रम-1 का नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है। इस सफलता के साथ भारत, अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा ऐसा देश बन गया है जहाँ किसी निजी कंपनी ने ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता का प्रदर्शन किया है।

गौतम अदाणी की प्रतिक्रिया

गौतम अदाणी ने एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा, 'इतिहास रच दिया गया है। विक्रम-1 ने अपनी पहली ऑर्बिटल फ्लाइट में मिशन के सभी उद्देश्यों को शानदार तरीके से पूरा किया है। यही आत्मनिर्भर भारत का असली प्रमाण है।'

उन्होंने स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक पवन चंदाना और भारत डाका, पूरी टीम तथा मिशन को संभव बनाने में सहयोग करने वाले इसरो एवं आईएन-स्पेस को हार्दिक बधाई दी।

अदाणी ने टीम की युवा ऊर्जा को रेखांकित करते हुए कहा, 'इस टीम की औसत उम्र सिर्फ 28 वर्ष है। यह पूरी दुनिया के लिए इस बात का प्रमाण है कि युवा भारत क्या हासिल कर सकता है। जय हिंद!'

भारत के निजी स्पेस सेक्टर पर असर

यह मिशन ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार निजी अंतरिक्ष कंपनियों को प्रोत्साहित करने के लिए नीतिगत सुधारों पर जोर दे रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, विक्रम-1 की सफलता वैश्विक कमर्शियल लॉन्च बाजार में भारत की स्थिति को और मजबूत करेगी, जहाँ SpaceX जैसी कंपनियाँ पहले से अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।

आलोचकों का कहना है कि हालाँकि यह उपलब्धि उत्साहजनक है, असली परीक्षा व्यावसायिक पैमाने पर नियमित और किफायती लॉन्च सेवाएँ देने में होगी।

आगे की राह

स्काईरूट एयरोस्पेस की यह सफलता भारत के उभरते निजी स्पेस इकोसिस्टम के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। आने वाले समय में कंपनी से छोटे उपग्रहों के लिए नियमित व्यावसायिक लॉन्च मिशनों की उम्मीद की जा रही है, जो भारत को वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने में सहायक होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह उत्साह तब और ठोस होगा जब स्काईरूट एयरोस्पेस नियमित और किफायती व्यावसायिक लॉन्च का प्रदर्शन करे — क्योंकि SpaceX की बाजार में पकड़ तोड़ना आसान नहीं। गौरतलब है कि भारत का निजी स्पेस सेक्टर नीतिगत उदारीकरण के बाद तेजी से उभरा है, पर वित्त पोषण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा अभी भी बड़ी चुनौतियाँ हैं। 28 वर्ष की औसत आयु वाली टीम की यह उपलब्धि भारत की तकनीकी प्रतिभा का प्रमाण है, किंतु असली कसौटी व्यावसायिक पैमाने पर टिकाऊ सफलता में होगी।
RashtraPress
18 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विक्रम-1 रॉकेट क्या है और इसे किसने बनाया?
विक्रम-1 हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा निर्मित चार-चरणीय लॉन्च व्हीकल है, जिसे छोटे उपग्रहों के लिए त्वरित और माँग-आधारित लॉन्च सेवाएँ देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसका नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है।
विक्रम-1 की ऑर्बिटल लॉन्चिंग क्यों ऐतिहासिक है?
इस सफलता के साथ भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा देश बन गया जहाँ किसी निजी कंपनी ने रॉकेट को कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया। यह भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए एक निर्णायक मील का पत्थर है।
मिशन आगमन में विक्रम-1 कितनी ऊँचाई तक पहुँचा?
18 जुलाई 2026 को 'मिशन आगमन' के तहत विक्रम-1 पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में लगभग 450 किलोमीटर की ऊँचाई तक पहुँचा और मिशन के सभी उद्देश्य सफलतापूर्वक पूरे किए।
गौतम अदाणी ने विक्रम-1 की सफलता पर क्या कहा?
गौतम अदाणी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि 'इतिहास रच दिया गया है' और इस उपलब्धि को 'आत्मनिर्भर भारत का असली प्रमाण' बताया। उन्होंने स्काईरूट की टीम, इसरो और आईएन-स्पेस को बधाई दी तथा टीम की औसत आयु मात्र 28 वर्ष होने को युवा भारत की शक्ति का प्रतीक बताया।
विक्रम-1 की सफलता का भारत के कमर्शियल स्पेस सेक्टर पर क्या असर होगा?
यह मिशन वैश्विक कमर्शियल लॉन्च बाजार में भारत की स्थिति को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। स्काईरूट एयरोस्पेस अब छोटे उपग्रहों के लिए नियमित व्यावसायिक लॉन्च सेवाएँ देने की स्थिति में होगी, जिससे भारत वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख खिलाड़ी बन सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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