18 जुलाई 2026
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विक्रम-1 ने 450 किमी कक्षा में पेलोड स्थापित किया, भारत बना निजी ऑर्बिटल लॉन्च में दुनिया का तीसरा देश

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विक्रम-1 ने 450 किमी कक्षा में पेलोड स्थापित किया, भारत बना निजी ऑर्बिटल लॉन्च में दुनिया का तीसरा देश

सारांश

विक्रम-1 की सफल उड़ान सिर्फ एक रॉकेट का परीक्षण नहीं — यह भारत के निजी अंतरिक्ष युग की औपचारिक शुरुआत है। 450 किमी की कक्षा में पेलोड स्थापित कर स्काईरूट ने साबित किया कि सरकारी इसरो के बाद अब निजी कंपनियाँ भी अंतरिक्ष तक पहुँचने में सक्षम हैं।

मुख्य बातें

स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 रॉकेट 18 जुलाई 2026 को श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित हुआ।
रॉकेट ने पेलोड को पृथ्वी से 450 किलोमीटर की ऊँचाई पर 60 डिग्री झुकाव वाली LEO में स्थापित किया।
भारत निजी क्षेत्र में ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का तीसरा देश बना।
विक्रम-1 में तीन सॉलिड-फ्यूल चरण (कलाम-1200, कलाम-250, कलाम-100) और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल है; यह 350 किग्रा तक पेलोड ले जाने में सक्षम।
पेलोड में स्कोप सैटेलाइट, सोलर्स एस3, 'इमब्रेस' रोबोटिक आर्म और 18-कैरेट सोने का माइक्रो-रॉकेट शामिल।
रॉकेट 3D-प्रिंटेड लिक्विड इंजन और कार्बन कम्पोजिट स्ट्रक्चर से निर्मित — भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग की तकनीकी छलाँग।

स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 रॉकेट 18 जुलाई 2026 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित हुआ और पृथ्वी से लगभग 450 किलोमीटर की ऊँचाई पर अपनी निर्धारित कक्षा में पेलोड स्थापित करने में कामयाब रहा। इस उपलब्धि के साथ भारत, निजी क्षेत्र में ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया है — एक ऐसी उपलब्धि जो देश के अंतरिक्ष इतिहास में नए अध्याय की शुरुआत करती है।

मिशन की मुख्य उड़ान-प्रक्रिया

लिफ्ट-ऑफ के बाद टी+10 सेकंड पर विक्रम-1 लॉन्च टॉवर से सुरक्षित रूप से अलग हो गया। पहले चरण के इंजन कलाम-1200 ने रॉकेट को वायुमंडल के सबसे घने हिस्से से बाहर निकाला और अलग हो गया। इसके बाद पेलोड फेयरिंग अलग हुई, जिसने वायुमंडलीय यात्रा के दौरान पेलोड को सुरक्षित रखा था।

दूसरे चरण के इंजन कलाम-250 ने अपना दहन पूरा कर रॉकेट को अगले पड़ाव की ओर धकेला। तीसरे और सबसे ऊँचाई तक जाने वाले सॉलिड चरण कलाम-100 ने रॉकेट को कक्षा की दिशा में अंतिम गति दी। अंततः लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल ने अंतिम बर्न पूरा कर पेलोड को 450 किलोमीटर की लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 60 डिग्री के झुकाव पर स्थापित किया।

विक्रम-1 की तकनीकी विशेषताएँ

हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित विक्रम-1 में तीन सॉलिड-फ्यूल चरण और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है। यह रॉकेट 350 किलोग्राम तक के पेलोड को LEO में पहुँचाने में सक्षम है।

यह लॉन्च व्हीकल पूरी तरह कार्बन कम्पोजिट स्ट्रक्चर, सॉलिड-फ्यूल बूस्टर और 3D-प्रिंटेड लिक्विड इंजन से निर्मित है — जो इसे भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक तकनीकी छलाँग बनाता है। गौरतलब है कि यह भारत में निजी क्षेत्र द्वारा निर्मित पहला ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट है।

पेलोड: क्या-क्या भेजा अंतरिक्ष में

इस परीक्षण उड़ान में कई ग्राहक पेलोड भेजे गए। इनमें स्काईरूट का स्कोप सैटेलाइट, डीक्यूब्ड का टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन पेलोड, ग्रह स्पेस का सोलर्स एस3 सैटेलाइट और कॉस्मोसर्व स्पेस का 'इमब्रेस' रोबोटिक आर्म शामिल हैं। यह रोबोटिक आर्म विशेष रूप से ऑर्बिटल मलबे — यानी अंतरिक्ष में मौजूद कचरे — को पकड़ने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

इसके अलावा इस उड़ान में 'कॉस्मिक ब्लूम' नाम की फूलों के आकार की कलाकृति और 18-कैरेट सोने का एक माइक्रो-रॉकेट भी भेजा गया, जिस पर महान वैज्ञानिकों सी.वी. रमन, विक्रम साराभाई और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की सूक्ष्म मूर्तियाँ उकेरी गई हैं।

भारत के अंतरिक्ष इतिहास में महत्व

यह सफलता ऐसे समय में आई है जब भारत सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने की नीति अपनाई है और IN-SPACe जैसी नियामक संस्था के ज़रिए स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित किया जा रहा है। स्काईरूट की यह उड़ान उस नीतिगत बदलाव का पहला बड़ा व्यावहारिक परिणाम है।

यह Nवीं बार है जब भारत ने वैश्विक अंतरिक्ष दौड़ में एक नई श्रेणी में प्रवेश किया है — इससे पहले इसरो ने चंद्रयान-3 और मंगलयान से दुनिया को चौंकाया था। अब निजी क्षेत्र भी उसी पथ पर है। आगे स्काईरूट वाणिज्यिक उड़ानों की ओर बढ़ेगी, जिससे भारतीय उपग्रह ऑपरेटरों को किफ़ायती लॉन्च विकल्प मिल सकेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी अब शुरू होती है — वाणिज्यिक उड़ानों की विश्वसनीयता, प्रति-किलोग्राम लागत और लॉन्च आवृत्ति। दुनिया के अन्य निजी अंतरिक्ष खिलाड़ियों — SpaceX, RocketLab — ने पहली सफल उड़ान के बाद भी कई विफलताएँ देखीं। भारत की IN-SPACe नीति सही दिशा में है, पर नियामक स्पष्टता और दीर्घकालिक सरकारी खरीद प्रतिबद्धता के बिना स्टार्टअप इकोसिस्टम को टिकाऊ बनाना चुनौतीपूर्ण रहेगा। स्काईरूट की यह उड़ान भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक शानदार प्रमाण-पत्र है — अब देखना यह है कि यह एकल उपलब्धि से उद्योग में बदलती है या नहीं।
RashtraPress
18 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विक्रम-1 रॉकेट क्या है और इसे किसने बनाया?
विक्रम-1 भारत का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट है, जिसे हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस ने बनाया है। यह 350 किलोग्राम तक के पेलोड को 450 किलोमीटर की लो अर्थ ऑर्बिट में स्थापित करने में सक्षम है।
विक्रम-1 की लॉन्च तारीख और स्थान क्या था?
विक्रम-1 को 18 जुलाई 2026 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया। यह रॉकेट की पहली परीक्षण उड़ान (टेस्ट फ्लाइट-1) थी।
इस मिशन से भारत को क्या उपलब्धि मिली?
इस सफलता के साथ भारत निजी क्षेत्र में ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया। यह भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी का पहला बड़ा व्यावहारिक प्रमाण है।
विक्रम-1 में कौन-कौन से पेलोड भेजे गए?
इस उड़ान में स्काईरूट का स्कोप सैटेलाइट, डीक्यूब्ड का टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन पेलोड, ग्रह स्पेस का सोलर्स एस3 सैटेलाइट और कॉस्मोसर्व स्पेस का 'इमब्रेस' रोबोटिक आर्म शामिल थे। साथ ही 'कॉस्मिक ब्लूम' कलाकृति और सी.वी. रमन, विक्रम साराभाई व ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की सूक्ष्म मूर्तियों वाला 18-कैरेट सोने का माइक्रो-रॉकेट भी अंतरिक्ष में भेजा गया।
विक्रम-1 की तकनीक अन्य रॉकेटों से कैसे अलग है?
विक्रम-1 में तीन सॉलिड-फ्यूल चरण (कलाम-1200, कलाम-250, कलाम-100) और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल है। यह पूरी तरह कार्बन कम्पोजिट स्ट्रक्चर और 3D-प्रिंटेड लिक्विड इंजन से बना है, जो इसे हल्का और किफ़ायती बनाता है।
राष्ट्र प्रेस
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