उस्ताद अल्ला रक्खा खां: 12 साल की उम्र में शुरू हुई तबले की साधना, जिसने बदल दी भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया
सारांश
Key Takeaways
- उस्ताद अल्ला रक्खा खां का जन्म 29 अप्रैल 1919 को जम्मू-कश्मीर के घगवाल गाँव में हुआ था।
- मात्र 12 वर्ष की आयु में तबले की साधना शुरू कर वे ऑल इंडिया रेडियो के पहले एकल तबला वादक बने।
- पंडित रवि शंकर के साथ 1960 के दशक में जुगलबंदी ने मॉन्टेरी पॉप फेस्टिवल और वुडस्टॉक में भारतीय संगीत की धूम मचाई।
- वर्ष 1985 में मुंबई में अल्ला रक्खा इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूजिक की स्थापना की, जहाँ सैकड़ों शिष्यों को प्रशिक्षित किया।
- वर्ष 1977 में पद्मश्री और वर्ष 1982 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित; 3 फरवरी 2000 को निधन।
- सुपुत्र उस्ताद जाकिर हुसैन को 2023 में पद्म विभूषण से नवाज़ा गया।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में तबला वादन को वैश्विक मंच पर पहुँचाने वाले महान उस्ताद अल्ला रक्खा खां ने मात्र 12 वर्ष की आयु में अपना सम्पूर्ण जीवन तबले की साधना को समर्पित कर दिया था। 1960 के दशक में पंडित रवि शंकर के साथ उनकी ऐतिहासिक जुगलबंदी ने यूरोप और अमेरिका में भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक नई लहर पैदा की। 29 अप्रैल 1919 को जम्मू-कश्मीर के घगवाल गाँव में जन्मे इस महान कलाकार की विरासत आज भी उनके सुपुत्र उस्ताद जाकिर हुसैन के माध्यम से जीवित है।
बचपन और संगीत की राह
उस्ताद अल्ला रक्खा खां का जन्म 29 अप्रैल 1919 को जम्मू-कश्मीर के घगवाल गाँव में एक मुस्लिम डोगरा परिवार में हुआ था। बचपन से ही संगीत के प्रति उनका गहरा अनुराग था, हालाँकि परिवार की इच्छा नहीं थी कि वे इस क्षेत्र में कदम रखें। परिवार की इच्छा के विरुद्ध जाकर उन्होंने संगीत की राह चुनी और पंजाब घराने के प्रख्यात उस्ताद मियां कादिर बख्श से तबले की शिक्षा ग्रहण की।
तबले के साथ-साथ उन्होंने पखावज भी बजाया। उनकी असाधारण प्रतिभा और अटूट समर्पण का ही परिणाम था कि कम समय में ही वे ऑल इंडिया रेडियो के पहले एकल तबला वादक बन गए। ताल पर असीम नियंत्रण, तेज गति की बोलियाँ और भावपूर्ण प्रस्तुति उनकी वादन शैली की विशिष्ट पहचान थी।
रवि शंकर के साथ जुगलबंदी और वैश्विक पहचान
अल्ला रक्खा खां को विश्व पटल पर तबले को पहुँचाने का श्रेय मुख्य रूप से पंडित रवि शंकर के साथ उनकी दीर्घकालीन जोड़ी को जाता है। 1960 के दशक में इस जुगलबंदी ने पश्चिमी देशों में भारतीय संगीत के प्रति एक नई जिज्ञासा जगाई। मॉन्टेरी पॉप फेस्टिवल और वुडस्टॉक जैसे विख्यात मंचों पर उनकी थापों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
गौरतलब है कि उस समय तक तबले को मुख्यतः संगत वाद्य के रूप में देखा जाता था। अल्ला रक्खा खां ने इस धारणा को बदला और तबले को एक स्वतंत्र एकल वाद्य के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।
शिक्षण और संस्थान की स्थापना
उन्होंने अनेक शास्त्रीय कलाकारों के साथ मिलकर काम किया और अपनी कला को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के प्रति भी उतने ही सजग रहे। वर्ष 1985 में उन्होंने मुंबई में अल्ला रक्खा इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूजिक की स्थापना की, जहाँ उन्होंने सैकड़ों शिष्यों को तबले की बारीकियाँ सिखाईं। यह संस्थान आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
सम्मान और पुरस्कार
उनकी असाधारण संगीत साधना को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया। वर्ष 1977 में उन्हें पद्मश्री और वर्ष 1982 में प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 3 फरवरी 2000 को हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया, परंतु उनके तबले की गूँज आज भी भारतीय संगीत के आकाश में अमर है।
विरासत: उस्ताद जाकिर हुसैन
उस्ताद अल्ला रक्खा खां के सुपुत्र उस्ताद जाकिर हुसैन ने पिता से मिली संगीत विरासत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। वर्ष 1988 में सबसे कम उम्र में तबला वादन के लिए पद्मश्री, वर्ष 2002 में पद्म भूषण और वर्ष 2023 में भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्राप्त करने वाले जाकिर हुसैन आज तबला वादन की दुनिया के सुपरस्टार माने जाते हैं। पिता की थाप, बेटे की उँगलियों में आज भी जीवित है।