क्या भारत की प्रणाली विधायी, कार्यपालिका और न्यायिक कार्यों का अनूठा संयोजन है? : किरेन रिजिजू

सारांश
Key Takeaways
- भारत की प्रणाली एक अनूठा संयोजन है।
- सांसदों की दोहरी भूमिका होती है।
- संविधान की भावना को समझना आवश्यक है।
- सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी का महत्व है।
- न्याय की पहुँच केवल अदालतों के माध्यम से नहीं है।
बेंगलुरु, 30 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। कर्नाटक के बेंगलुरु में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने शनिवार को उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने भारत की संसदीय प्रणाली के अनूठे पहलुओं पर चर्चा की।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भारत की प्रणाली और वेस्टमिंस्टर मॉडल के बीच अंतर पर प्रकाश डाला और संविधान और उसकी भावना को समझने के महत्व पर जोर दिया।
उन्होंने बताया कि भारत की प्रणाली विधायी, कार्यपालिका और न्यायिक कार्यों का एक अनूठा संयोजन है, जहां संसद के सदस्य मंत्री पद धारण कर सकते हैं।
रिजिजू ने इसकी तुलना अमेरिकी प्रणाली से की, जहां सचिवों को सदन की समितियों द्वारा बुलाया जाता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय सांसदों की दोहरी भूमिका होती है, एक तो सांसद के रूप में और दूसरी अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के लिए समस्या समाधानकर्ता के रूप में, जो अक्सर व्यक्तिगत समस्याओं और सहायता के अनुरोधों के साथ उनके पास आते हैं।
उन्होंने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों की उच्च अपेक्षाओं और मांगों का उल्लेख किया, जो कभी-कभी बहुत अधिक हो सकती हैं। उन्होंने विधायी कर्तव्यों को निर्वाचन क्षेत्र की सेवा के साथ संतुलित करने के महत्व पर भी जोर दिया।
इस दौरान रिजिजू ने संसद में पिछले कुछ वर्षों में चर्चा के स्तर में आई गिरावट पर दुख व्यक्त किया और इसके लिए बदलते समय और प्राथमिकताओं को जिम्मेदार ठहराया।
केंद्रीय मंत्री ने राजनीति और शासन के प्रति अपने दृष्टिकोण का हवाला देते हुए सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और निष्ठा के महत्व पर जोर दिया।
उन्होंने संविधान के महत्व और आम लोगों को न्याय दिलाने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि न केवल अदालतों के माध्यम से बल्कि अन्य माध्यमों से भी लोगों को न्याय मिल रहा है। उन्होंने भारत की संसदीय प्रणाली की जटिलताओं, संसद सदस्यों के सामने आने वाली चुनौतियों और संविधान की भावना को बनाए रखने के महत्व के बारे में भी बताया।