भारतीय सेना ने असम के लेखापानी में WWII बम निष्क्रिय किया, घनी बस्ती में बड़ा हादसा टला
सारांश
Key Takeaways
भारतीय सेना की रेड शील्ड सैपर्स यूनिट ने 30 अप्रैल 2025 को असम के लेखापानी क्षेत्र में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय का एक अत्यंत खतरनाक बिना फटा हुआ बम (UXO) सफलतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, लेडो के इस घनी आबादी वाले इलाके में मिले इस विस्फोटक को समय रहते नष्ट कर एक बड़ी तबाही टाल ली गई।
बम कहाँ और कैसे मिला
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, लेडो के लेखापानी इलाके की एक नागरिक बस्ती में यह बम मिला। बम की लंबाई करीब 12 इंच और व्यास 6 इंच बताई गई है। इतने पुराने और सक्रिय विस्फोटक की मौजूदगी की खबर फैलते ही स्थानीय निवासियों में दहशत का माहौल बन गया।
सेना का त्वरित अभियान
सूचना मिलते ही रेड शील्ड सैपर्स की विशेष बम निरोधक टीम तत्काल मौके पर पहुँची। टीम ने सबसे पहले पूरे इलाके को सुरक्षित घेरे में लिया और आसपास के निवासियों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया। मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का कड़ाई से पालन करते हुए एक सख्त सुरक्षा परिधि स्थापित की गई।
इसके बाद बम को अत्यधिक सावधानी के साथ निष्क्रिय किया गया और आबादी से दूर एक सुरक्षित स्थान पर ले जाकर नियंत्रित विस्फोट के ज़रिए पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। सेना के अधिकारियों ने पुष्टि की कि पूरे ऑपरेशन के दौरान किसी भी प्रकार की जनहानि या संपत्ति का नुकसान नहीं हुआ।
सेना की सराहना
सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने बम निरोधक टीम के शानदार समन्वय, तकनीकी सटीकता और सुरक्षा प्रोटोकॉल के अनुशासित पालन की भूरि-भूरि प्रशंसा की। अधिकारियों ने कहा कि यदि समय पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह विस्फोटक नागरिकों के लिए घातक साबित हो सकता था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह घटना असम के उन कई इलाकों में से एक है जहाँ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश और जापानी सेनाओं के बीच हुए संघर्ष के अवशेष आज भी समय-समय पर मिलते रहते हैं। लेडो क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है — यहीं से प्रसिद्ध स्टिलवेल रोड शुरू होती थी, जो युद्धकाल में सामरिक दृष्टि से निर्णायक मानी जाती थी। गौरतलब है कि यह इस क्षेत्र में इस तरह की कोई पहली घटना नहीं है और विशेषज्ञ मानते हैं कि इस भूभाग में अभी और UXO दबे हो सकते हैं।
इस सफल ऑपरेशन ने एक बार फिर यह रेखांकित किया है कि युद्धकालीन विस्फोटकों का खतरा दशकों बाद भी बना रहता है और सेना की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता नागरिक सुरक्षा में कितनी अहम भूमिका निभाती है।