क्या बिहार में चूड़ा-दही भोज के दौरान सूरजभान सिंह ने पशुपति पारस से बातचीत की?

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क्या बिहार में चूड़ा-दही भोज के दौरान सूरजभान सिंह ने पशुपति पारस से बातचीत की?

सारांश

बिहार की राजनीति में एक नई हलचल! सूरजभान सिंह और पशुपति पारस की चूड़ा-दही भोज में मुलाकात ने सियासी चर्चाओं को तेज कर दिया है। क्या यह मुलाकात राजनीतिक पुनर्गठन का संकेत है? जानें सभी महत्वपूर्ण पहलू इस रिपोर्ट में।

मुख्य बातें

सूरजभान सिंह की पशुपति पारस से मुलाकात राजनीतिक चर्चाओं का नया केंद्र है।
चूड़ा-दही भोज में भाग लेकर दोनों नेताओं ने नए समीकरण बनाने का संकेत दिया।
आरएलजेपी के खराब चुनावी प्रदर्शन ने पुनर्गठन की अटकलें बढ़ा दी हैं।
सूरजभान सिंह की राजनीतिक रणनीति में बदलाव देखने को मिल सकता है।
पशुपति पारस की पार्टी के भविष्य की दिशा पर सवाल उठ रहे हैं।

पटना, 15 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। बिहार की राजनीति में फिर से कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिल रहे हैं। इस क्रम में प्रमुख नेता सूरजभान सिंह ने गुरुवार को मकर संक्रांति के अवसर पर राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (आरएलजेपी) के प्रमुख पशुपति कुमार पारस के निवास पर जाकर पारंपरिक चूड़ा-दही भोज का हिस्सा बने।

हाल के विधानसभा चुनावों के बाद बिहार की राजनीति में आए बदलावों के बीच इस मुलाकात ने काफी ध्यान आकर्षित किया है।

विधानसभा चुनाव से पहले, सूरजभान सिंह ने पशुपति पारस की आरएलजेपी से नाता तोड़कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में कदम रखा था।

उनकी पत्नी वीणा देवी ने राजद के टिकट पर मोकामा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन जदयू उम्मीदवार अनंत सिंह से हार का सामना करना पड़ा।

इस चुनावी हार के बाद सूरजभान सिंह की राजनीतिक रणनीति में बदलाव देखने को मिल रहा है, और पशुपति पारस के साथ उनकी बढ़ती नजदीकी पर अटकलें तेज हो गई हैं।

पशुपति पारस की आरएलजेपी को हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में कोई सीट नहीं मिली।

पार्टी के खराब प्रदर्शन और सूरजभान सिंह की आरएलजेपी में वापसी की अटकलों ने राजनीतिक गलियारों में संभावित पुनर्गठन की चर्चाओं को बढ़ावा दिया है।

हालांकि, सूरजभान सिंह और पशुपति पारस का संबंध कई वर्षों पुराना है।

जब राम विलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) की स्थापना की थी, तब सूरजभान सिंह उनके सबसे भरोसेमंद नेताओं में से एक माने जाते थे।

2019 के लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी में आंतरिक मतभेद उभरने लगे और 2020 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा।

राम विलास पासवान के निधन के बाद एलजेपी दो गुटों में बंट गई।

चिराग पासवान ने एलजेपी (राम विलास) पर अपना नियंत्रण बनाए रखा, जबकि पशुपति पारस, प्रिंस पासवान, चंदन सिंह (सूरजभान सिंह के भाई), और कई सांसदों ने एक अलग गुट बना लिया।

पारस बाद में केंद्रीय मंत्री बने, लेकिन एनडीए ने 2024 के लोकसभा चुनावों में उनके गुट को कोई सीट आवंटित नहीं की।

इसके विपरीत, एनडीए के भीतर चिराग पासवान की राजनीतिक स्थिति काफी मजबूत हुई है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सूरजभान सिंह और पशुपति पारस की मुलाकात का क्या महत्व है?
यह मुलाकात बिहार की राजनीति में संभावित पुनर्गठन का संकेत दे सकती है।
क्या सूरजभान सिंह फिर से आरएलजेपी में शामिल हो सकते हैं?
इसके लिए अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन अटकलें तेज हैं।
पशुपति पारस की पार्टी का चुनावी प्रदर्शन कैसा रहा?
हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को कोई सीट नहीं मिली।
राष्ट्र प्रेस
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