चारधाम यात्रा: तीर्थाटन का महत्व समझाते हुए बोले स्वामी चिदानंद
सारांश
Key Takeaways
- चारधाम यात्रा केवल पर्यटन नहीं, बल्कि तीर्थाटन है।
- यात्रा से आत्मिक शांति और मन की शुद्धि होती है।
- गंगा के तटों को प्रदूषित न करने की आवश्यकता है।
- प्रदूषण रहित यात्रा का संकल्प लेना चाहिए।
- प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए पेड़ लगाने का संकल्प लें।
ऋषिकेश, 18 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। स्वामी चिदानंद सरस्वती ने चारधाम यात्रा के प्रारंभ पर सभी यात्रियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यात्रियों को समझना चाहिए कि यह तीर्थाटन है, पर्यटन नहीं।
ऋषिकेश में स्वामी चिदानंद ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत के दौरान कहा कि आज विश्व धरोहर दिवस भी है। मैं चारधाम यात्रा पर निकलने वाले सभी जत्थों का अभिनंदन करता हूं और सभी यात्रियों का स्वागत करता हूं। उत्तराखंड सुरक्षित है।
उन्होंने बताया कि उत्तराखंड दिव्य और भव्य है। यह देवों की भूमि है, देवताओं का निवास है। उत्तराखंड पवित्रता और दिव्यता की धरती है, इसलिए चारधाम की यात्रा केवल बाहरी यात्रा नहीं है, बल्कि आंतरिक यात्रा भी है।
स्वामी ने कहा कि जब यात्री बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री पहुँचते हैं, तो केवल उनके द्वार पर नहीं, बल्कि भीतर के द्वार भी खुल जाते हैं। वहां मन शांत हो जाता है और शब्द गौण हो जाते हैं।
स्वामी चिदानंद ने स्पष्ट किया कि चारधाम यात्रा केवल पर्यटन नहीं है, बल्कि यह तीर्थाटन की यात्रा है। यह मन को शुद्ध करने का अवसर है।
उन्होंने कहा कि आज इस यात्रा पर हम सबका, परमार्थ निकेतन ऋषिकेश से हिमालय की इस पवित्र धरती से अभिनंदन करते हैं।
स्वामी ने साझा किया कि लोग बड़ी आस्था के साथ आते हैं। कुंभ मेला इसका प्रमाण है कि आस्था हमेशा व्यवस्था से बड़ी होती है। अच्छी बात यह है कि उत्तराखंड सरकार और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चारधाम यात्रा की व्यवस्था में कोई कमी नहीं छोड़ी है। पर्यटन विभाग पूरी तरह जुटा हुआ है ताकि यह यात्रा सच्चे तीर्थाटन का रूप ले सके।
स्वामी चिदानंद ने कहा कि यह चारधाम यात्रा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को याद दिलाती है। आस्था महान है, लेकिन जब व्यवस्थाएं सुंदर होती हैं, तो अधिक लोग तीर्थों की दिव्यता का अनुभव कर सकते हैं। यह आस्था और व्यवस्था का संगम है।
स्वामी चिदानंद ने गंगा को जीवन रेखा और मां बताया। उन्होंने कहा कि गंगा जीवनदायिनी है। उन्होंने अपील की कि जो भी तीर्थों पर आते हैं, वे गंगा के तटों को प्रदूषित न करें। पूजा और प्रदूषण साथ-साथ नहीं चल सकते।
उन्होंने संकल्प दिलाया कि चारधाम यात्रा के दौरान सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करें। यदि उपयोग करें तो उसे अपने साथ वापस ले आएं।
स्वामी ने कहा कि यात्रा से पुण्य मिलेगा, लेकिन हरित यात्रा से और अधिक पुण्य मिलेगा। यात्रा पर आकर पेड़ न काटें, बल्कि पेड़ लगाने का संकल्प लेकर जाएं।
स्वामी ने यात्रियों से आग्रह किया कि जल को प्रदूषित न करें और शांति से आएं और लौटें। कोई हुड़दंग न करें।