साइबर ठगी पर शिकंजा: अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट में रखे 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम से निपटने के अहम सुझाव

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साइबर ठगी पर शिकंजा: अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट में रखे 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम से निपटने के अहम सुझाव

सारांश

'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम पर शिकंजा कसने के लिए अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक रिपोर्ट पेश की — SIM बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन से लेकर RBI की SOP और IT एक्ट संशोधन तक। यह रिपोर्ट भारत की डिजिटल सुरक्षा के लिए एक केंद्रीकृत राष्ट्रीय ढाँचे की नींव रख सकती है।

Key Takeaways

  • अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने 28 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट में साइबर अपराध रोकने पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की।
  • बायोमेट्रिक SIM वेरिफिकेशन और पॉइंट ऑफ सेल एजेंट्स की जवाबदेही सख्त करने की सिफारिश।
  • टेलीकॉम कंपनियों द्वारा जाँच एजेंसियों को रियल-टाइम डेटा उपलब्ध कराने का प्रस्ताव।
  • डिलीट अकाउंट्स का डेटा कम से कम 180 दिनों तक सुरक्षित रखने की माँग।
  • RBI की SOP लागू कर संदिग्ध खातों पर अस्थायी डेबिट रोक और राष्ट्रीय साइबर वित्तीय धोखाधड़ी ढाँचा बनाने का सुझाव।
  • IT एक्ट में संशोधन और सेक्शन 43 के मामलों के लिए ऑनलाइन शिकायत पोर्टल जल्द शुरू करने का आग्रह।

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने 28 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट में भारत में तेज़ी से बढ़ते साइबर अपराधों — विशेषकर 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम — पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में विभिन्न हितधारकों से परामर्श के बाद कई ठोस सुझाव दिए गए हैं और शीर्ष अदालत से इनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए निर्देश जारी करने का आग्रह किया गया है।

दूरसंचार क्षेत्र में सुधार के सुझाव

रिपोर्ट में दूरसंचार विभाग को टेलीकॉम सेवा प्रदाताओं के साथ मिलकर यूजर पहचान प्रणाली को मज़बूत करने की सिफारिश की गई है। इसके तहत टेलीकम्युनिकेशन (यूजर आइडेंटिफिकेशन) नियम और बायोमेट्रिक आइडेंटिटी वेरिफिकेशन सिस्टम को शीघ्र लागू करने पर ज़ोर दिया गया है, ताकि सिम कार्ड जारी करने की प्रक्रिया पर राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी रखी जा सके।

इसके साथ ही, सिम एक्टिवेशन में शामिल पॉइंट ऑफ सेल एजेंट्स के सत्यापन और उनकी जवाबदेही को सख्त करने का सुझाव दिया गया है। साइबर अपराधों में उपयोग हो रहे सिम कार्ड्स को तेज़ी से ब्लॉक करने के लिए एक प्रभावी व्यवस्था विकसित करने की भी बात कही गई है। रिपोर्ट में यह भी प्रस्तावित है कि टेलीकॉम कंपनियाँ जाँच एजेंसियों को रियल-टाइम डेटा — जैसे सब्सक्राइबर एक्टिवेशन और अन्य जानकारी — उपलब्ध कराएँ।

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सुरक्षा उपाय

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को सुझाव दिया गया है कि वह व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स पर अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करवाए। इनमें सिम बाइंडिंग मैकेनिज्म, लंबी अवधि तक चलने वाले स्कैम कॉल्स की पहचान और रोकथाम के उपाय तथा स्काइप जैसे प्लेटफॉर्म्स की तर्ज पर नए सुरक्षा फीचर्स शामिल हैं।

रिपोर्ट में इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर भी ज़ोर दिया गया है। यह ऐसे समय में आया है जब 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे स्कैम में नागरिकों को फ़र्ज़ी पुलिस या CBI अधिकारी बनकर वीडियो कॉल पर घंटों बंधक बनाया जाता है और लाखों रुपये ठगे जाते हैं।

डिवाइस ब्लॉकिंग और डेटा संरक्षण

रिपोर्ट में ऐसे डिवाइसों की पहचान कर उन्हें ब्लॉक करने की व्यवस्था बनाने की सिफारिश की गई है, ताकि वे नए नंबर के ज़रिए दोबारा अकाउंट न बना सकें। इसके अलावा, डिलीट किए गए अकाउंट्स का डेटा कम से कम 180 दिनों तक सुरक्षित रखने की बात कही गई है, जो जाँच एजेंसियों के लिए साक्ष्य संग्रह में सहायक होगा।

वित्तीय धोखाधड़ी पर नियंत्रण

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा तैयार स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को मंजूरी देने और लागू करने का आग्रह किया गया है। इसके तहत संदिग्ध खातों पर अस्थायी डेबिट रोक लगाने और साइबर वित्तीय धोखाधड़ी मामलों के लिए एक समान राष्ट्रीय ढाँचा तैयार करने का लक्ष्य है। गौरतलब है कि विभिन्न हाईकोर्ट के अलग-अलग आदेशों से उत्पन्न भ्रम को दूर करना भी इस प्रस्ताव का हिस्सा है।

आईटी कानून में संशोधन और आगे की राह

अटॉर्नी जनरल की रिपोर्ट में आईटी एक्ट में संशोधन की भी सिफारिश की गई है। मंत्रालय से कहा गया है कि वह आईटी एक्ट के तहत शिकायतों के निपटारे के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल जल्द शुरू करे, विशेष रूप से सेक्शन 43 से जुड़े मामलों के लिए। वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में सिविल दायित्व तय करने के लिए कानूनी ढाँचे को और सख्त बनाने की आवश्यकता भी बताई गई है। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से उम्मीद है कि डिजिटल अपराधों पर लगाम कसने के लिए एक केंद्रीकृत और बाध्यकारी राष्ट्रीय तंत्र अस्तित्व में आएगा।

Point of View

लेकिन असली चुनौती सुझावों को बाध्यकारी निर्देशों में बदलना है — जो भारत में नीति-से-क्रियान्वयन की दूरी को देखते हुए आसान नहीं है। 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम वर्षों से चल रहे हैं, फिर भी SIM वेरिफिकेशन और रियल-टाइम डेटा शेयरिंग जैसे बुनियादी उपाय अभी तक लागू नहीं हुए। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप ज़रूरी था, परंतु यदि विभिन्न मंत्रालयों और टेलीकॉम कंपनियों के बीच समन्वय की कमी रही, तो यह रिपोर्ट भी पिछले साइबर सुरक्षा दिशानिर्देशों की तरह फाइलों में दबकर रह सकती है। नागरिकों की डिजिटल सुरक्षा के लिए न्यायालय-निगरानी में समयबद्ध क्रियान्वयन ही एकमात्र विश्वसनीय रास्ता है।
NationPress
29/04/2026

Frequently Asked Questions

'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम क्या है?
'डिजिटल अरेस्ट' एक साइबर ठगी है जिसमें अपराधी फ़र्ज़ी पुलिस, CBI या कस्टम अधिकारी बनकर वीडियो कॉल पर पीड़ित को घंटों मानसिक दबाव में रखते हैं और लाखों रुपये ठग लेते हैं। यह भारत में सबसे तेज़ी से बढ़ते साइबर अपराधों में से एक बन चुका है।
अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में क्या सुझाव दिए हैं?
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने 28 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट पेश कर SIM बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, रियल-टाइम डेटा शेयरिंग, डिवाइस ब्लॉकिंग, RBI की SOP लागू करने और IT एक्ट में संशोधन जैसे सुझाव दिए। इनका उद्देश्य 'डिजिटल अरेस्ट' सहित साइबर वित्तीय धोखाधड़ी पर कड़ा नियंत्रण स्थापित करना है।
RBI की SOP साइबर ठगी रोकने में कैसे मदद करेगी?
RBI द्वारा तैयार स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के तहत संदिग्ध बैंक खातों पर अस्थायी डेबिट रोक लगाई जा सकेगी, जिससे ठगी की रकम तत्काल ट्रांसफर होने से रोकी जा सकेगी। इससे साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में एक समान राष्ट्रीय ढाँचा भी तैयार होगा।
डिलीट किए गए अकाउंट्स का डेटा 180 दिन तक रखने की सिफारिश क्यों की गई?
साइबर अपराधी अक्सर ठगी के बाद अपने अकाउंट डिलीट कर देते हैं, जिससे जाँच एजेंसियों को साक्ष्य नहीं मिल पाते। कम से कम 180 दिनों तक डेटा सुरक्षित रखने से जाँच में सहायता मिलेगी और अपराधियों को पकड़ना आसान होगा।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या कदम उठा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट अटॉर्नी जनरल की रिपोर्ट के आधार पर दूरसंचार विभाग, MeitY और RBI को बाध्यकारी निर्देश जारी कर सकता है। अदालत समयबद्ध क्रियान्वयन की निगरानी भी कर सकती है, जो इन सुझावों को महज़ कागज़ी सिफारिशों से आगे ले जाने के लिए ज़रूरी है।
Nation Press