क्या दिल्ली शब्दोत्सव 2026 में यूनिफॉर्म सिविल कोड की जरूरत है?
सारांश
Key Takeaways
- यूनिफॉर्म सिविल कोड की आवश्यकता पर जोर
- मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले का कानूनी अध्ययन
- सुप्रीम कोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण है
- ऐतिहासिक शोध पर आधारित निर्णय
- समाज में समानता की आवश्यकता
नई दिल्ली, 4 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली शब्दोत्सव 2026 में रविवार को आयोजित चर्चा में देश के महत्वपूर्ण संवैधानिक और ऐतिहासिक मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से यूनिफॉर्म सिविल कोड और मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले के कानूनी पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अपने विचार साझा किए।
यूनिफॉर्म सिविल कोड अब तक लागू क्यों नहीं हुआ, इस पर सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता विक्रमजीत बनर्जी ने कहा कि यह कोड होना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन यह एक ऐसा विषय है जिस पर अभी तक गंभीरता से काम नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड होना चाहिए, लेकिन इसे लागू करने की दिशा में ठोस पहल नहीं हो पाई है।
चर्चा के दौरान, सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा ने पूछा कि हम मथुरा में 'हरे कृष्णा-हरे कृष्णा' कब बोल सकेंगे। इस पर सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि इस विषय पर केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि बौद्धिक अभ्यास और ऐतिहासिक शोध के आधार पर आगे बढ़ना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर केस से जो सीख मिली, उसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी विवाद के समाधान के लिए ऐतिहासिक शोध से लेकर उसके एविडेंटरी वैल्यू और साइट इंस्पेक्शन जैसे तथ्यों के आधार पर ही अदालत में निर्णय होता है।
विष्णु शंकर जैन ने बताया कि मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए 20 सितंबर 2020 को पहला सिविल सूट मथुरा की अदालत में दायर किया गया था। वर्तमान में इस मामले का ओरिजिनल ट्रायल इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रहा है, जहां अदालत ने सभी संबंधित सूट अपने पास मंगवा लिए हैं।
उन्होंने आगे कहा कि ट्रायल की प्रक्रिया जारी है और इसमें कुछ समय लगना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें पूरा विश्वास है कि जब यह मामला अपने निष्कर्ष पर पहुंचेगा, तो जहां भगवान कृष्ण ने जन्म लिया, वहां हमें जल्द ही पूरे पाठ का अधिकार मिलेगा।