क्या पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन के लिए चुनाव आयोग से समय सीमा बढ़ाने की मांग की गई है?
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को जवाब देने का निर्देश दिया है।
- मतदाता सूची में अनियमितताएँ पाई गई हैं।
- तृणमूल कांग्रेस ने 15 जनवरी की समय सीमा बढ़ाने की मांग की है।
- मुख्य न्यायाधीश ने आयोग को एक सप्ताह का समय दिया।
- मतदाता संख्या में गिरावट हुई है।
नई दिल्ली, 12 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है। सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने तृणमूल कांग्रेस के सांसदों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए आयोग को निर्देश दिया कि वह 15 जनवरी की समय-सीमा बढ़ाने की उनकी मांग पर अपना पक्ष प्रस्तुत करे।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने तृणमूल सांसद डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन की याचिकाओं पर सुनवाई की। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि पश्चिम बंगाल में चल रहे एसआईआर के दौरान गंभीर प्रक्रियागत खामियाँ और अनियमितताएँ पाई गई हैं।
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के वकील ने जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने आयोग को एक सप्ताह का समय दिया और निर्देश दिया कि दोनों याचिकाओं पर एक संयुक्त जवाब प्रस्तुत किया जाए। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई अगले सोमवार को निर्धारित की।
इससे पहले, तृणमूल नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने सुप्रीम कोर्ट में अंतरिम आवेदन दाखिल कर चुनाव आयोग के खिलाफ तत्काल निर्देश देने की मांग की थी।
उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया मनमानी, अव्यवस्थित और अव्यावहारिक समय-सीमा के अंतर्गत चल रही है।
याचिका में कहा गया है कि 16 दिसंबर 2025 को जारी मसौदा मतदाता सूची के बाद पात्र और वास्तविक मतदाताओं की समस्याएँ और बढ़ गई हैं। दावा किया गया कि करीब 58.2 लाख मतदाताओं के नाम बिना किसी सूचना या व्यक्तिगत सुनवाई के सूची से हटा दिए गए, जो कानून और चुनाव आयोग की SOP का उल्लंघन है।
याचिका के अनुसार, मतदाताओं की कुल संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई है। यह गिरावट कथित तौर पर 'बैकएंड, केंद्रीकृत और सॉफ्टवेयर आधारित डिलीशन' के जरिए हुई, जिसमें निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO) की कोई प्रभावी भूमिका नहीं रही।
डेरेक ओ’ब्रायन ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने औपचारिक और कानूनी निर्देशों की जगह व्हाट्सएप संदेशों और मौखिक आदेशों के जरिए 50 से ज्यादा निर्देश जारी किए। उन्होंने इसे 'व्हाट्सऐप कमीशन' करार देते हुए कहा कि इस तरह की प्रक्रिया न केवल पारदर्शी है बल्कि इसका कोई कानूनी आधार या ऑडिट ट्रेल भी नहीं है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' नाम की एक अतिरिक्त श्रेणी बनाई गई है, जिसके तहत करीब 1.3 करोड़ मतदाताओं को बिना किसी लिखित आदेश या स्पष्ट दिशा-निर्देश के सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है। दावा किया गया कि यह श्रेणी गुप्त एल्गोरिद्म के आधार पर बनाई गई है, जिससे खासकर महिलाएँ और अल्पसंख्यक प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि शादी के बाद नाम बदलने या वर्तनी में अंतर को विसंगति माना जा रहा है।
याचिका में वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों और प्रवासी मजदूरों की समस्याओं का भी जिक्र किया गया है। कहा गया है कि अनिवार्य सशरीर उपस्थिति की शर्त ने इन वर्गों पर असमान बोझ डाल दिया है और इससे उनके मताधिकार से वंचित होने का खतरा बढ़ गया है।
तृणमूल सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट से दावों और आपत्तियों को जमा करने की अंतिम तारीख 15 जनवरी से आगे बढ़ाने, अनौपचारिक निर्देशों पर रोक लगाने, 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' श्रेणी को वापस लेने, ERO की वैधानिक भूमिका बहाल करने और 14 फरवरी को प्रस्तावित अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन को टालने की मांग की है।
याचिका में चेतावनी दी गई है कि मौजूदा हालात में यदि अंतिम मतदाता सूची जारी की गई, तो इससे कानून, निष्पक्षता और सटीकता से समझौता होगा और कई वास्तविक मतदाता बिना किसी प्रभावी उपाय के बाहर हो जाएंगे।