भारत के मत्स्य पालन क्षेत्र में 2015 से अब तक 39,272 करोड़ का निवेश, समुद्री उत्पादों का निर्यात दोगुना
सारांश
Key Takeaways
- भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण है।
- 2015 से अब तक 39,272 करोड़ रुपए का निवेश हुआ है।
- समुद्री उत्पादों का निर्यात दोगुना हो गया है।
- भारत अब दूसरे सबसे बड़े एक्वाकल्चर उत्पादक देश के रूप में उभरा है।
- सरकार उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के विकास पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
नई दिल्ली, 3 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। केंद्र सरकार ने शुक्रवार को घोषणा की कि भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र अब खाद्य सुरक्षा, रोजगार और निर्यात आय में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। 2015 से लेकर अब तक इस क्षेत्र में कुल 39,272 करोड़ रुपए का निवेश हुआ है।
मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अनुसार, इस सेक्टर में लगभग 3 करोड़ मछुआरों और मछली पालकों को रोजगार मिला है, जबकि पूरे वैल्यू चेन में इस क्षेत्र ने दोगुने लोगों को रोजगार दिया है।
मंत्रालय के अनुसार, भारत अब विश्व का दूसरा सबसे बड़ा एक्वाकल्चर उत्पादक बन चुका है और वैश्विक मछली उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी लगभग 8 प्रतिशत है।
देश में मछली उत्पादन 2019-20 में 141.64 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 197.75 लाख टन हो गया है, जो औसतन 7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्शाता है।
इसके अलावा, समुद्री उत्पादों का निर्यात पिछले दशक में दोगुना से अधिक हो गया है। यह 2013-14 में 30,213 करोड़ रुपए से बढ़कर 2024-25 में 62,408 करोड़ रुपए तक पहुँच गया है, जिसमें झींगा (श्रिम्प) निर्यात का सबसे बड़ा योगदान रहा है, जिसकी कीमत 43,334 करोड़ रुपए रही।
भारत अब लगभग 130 वैश्विक बाजारों में 350 से अधिक प्रकार के समुद्री उत्पाद निर्यात करता है। 2024-25 में कुल निर्यात का 36.42 प्रतिशत अमेरिका को गया, इसके बाद चीन, यूरोपीय संघ, दक्षिण-पूर्व एशिया, जापान और मध्य पूर्व का स्थान रहा।
निर्यात में वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी भी बढ़ी है, जो 2.5 प्रतिशत से बढ़कर 11 प्रतिशत हो गई है और इसकी कुल कीमत 742 मिलियन डॉलर तक पहुँच गई है।
सरकार प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत ट्यूना, सीबास, कोबिया, मड क्रैब, टाइगर श्रिम्प और समुद्री शैवाल जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों को बढ़ावा दे रही है। इसके साथ ही कोल्ड-चेन नेटवर्क, आधुनिक मछली पकड़ने के बंदरगाह और डिजिटल ट्रेसबिलिटी सिस्टम में निवेश किया जा रहा है।
भारत को 2025 में अमेरिका के समुद्री स्तनधारी संरक्षण अधिनियम (एमएमपीए) के तहत 'कम्पैरेबिलिटी' का दर्जा मिला है, जिससे उसके सबसे बड़े बाजार में समुद्री उत्पादों का निर्यात बिना रुकावट जारी रहेगा।
सरकार ने बताया कि तटीय राज्यों में झींगा पकड़ने वाले ट्रॉलर में टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (टीईडी) लगाने का कार्य तेजी से चल रहा है।
नियामकीय स्तर पर, सैनिटरी इम्पोर्ट परमिट सिस्टम को पूरी तरह डिजिटल बना दिया गया है और इसे नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम से जोड़ा गया है, जिससे मंजूरी का समय 30 दिनों से घटकर केवल 72 घंटे रह गया है।
आने वाले पांच वर्षों में सरकार वैल्यू-एडेड निर्यात को और बढ़ाने, इनलैंड एक्सपोर्ट हब विकसित करने और यूके, यूरोपीय संघ, एसियन (एएसईएएन) और पश्चिम एशिया जैसे बाजारों में भारत की उपस्थिति को मजबूत करने का लक्ष्य लेकर चल रही है।