क्या जैसलमेर के अलगोजा वादक तगाराम पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित होंगे?
सारांश
Key Takeaways
- तगाराम भील ने अलगोजा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
- उनकी मेहनत और संघर्ष ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार दिलवाया।
- यह पुरस्कार राजस्थान की लोक कला का सम्मान है।
- युवाओं को अलगोजा सीखने का प्रेरित करना चाहिए।
- उनकी कहानी प्रेरणा का स्रोत है।
जैसलमेर, २५ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। राजस्थान के जैसलमेर जिले के मूलसागर में जन्मे प्रसिद्ध अलगोजा वादक तगाराम भील को कला के क्षेत्र में उनके अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है।
इस घोषणा के बाद जैसलमेर और पूरे मरु क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है। तगाराम भील ने अपनी साधना, संघर्ष और समर्पण के माध्यम से पारंपरिक लोक वाद्ययंत्र अलगोजा को ना केवल भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी पहचान दिलाई है।
तगाराम भील का जन्म जैसलमेर के करीब १० किलोमीटर दूर स्थित मूलसागर गांव में हुआ और उन्होंने इसी गांव को अपनी कर्मभूमि बनाया। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े तगाराम ने लोकसंगीत को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। उन्होंने ३५ से अधिक देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति को विश्व स्तर पर पहुँचाया है। उनकी अलगोजा वादन शैली ने देश-विदेश में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है।
पद्मश्री सम्मान की जानकारी मिलने पर तगाराम भील ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में बताया कि रविवार सुबह करीब ११ बजे उन्हें दिल्ली से फोन आया, जिसके जरिए इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के बारे में जानकारी दी गई।
उन्होंने कहा कि अलगोजा देश की सांस्कृतिक विरासत है और युवाओं को इस पारंपरिक वाद्ययंत्र को सीखकर आगे बढ़ाना चाहिए, ताकि यह कला आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।
तगाराम भील के जीवन की शुरुआत संघर्षों से भरी रही। जब उनका जन्म हुआ, तब उनके पिता केवल मनोरंजन के लिए अलगोजा बजाते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण तगाराम के पिता उन्हें बकरियां चराने भेजते थे, जबकि वे स्वयं ऊंट पर लकड़ी बेचकर परिवार का भरण-पोषण करते थे। बचपन से ही तगाराम को अलगोजा में गहरी रुचि थी। वह चोरी-छिपे पिता का अलगोजा लेकर जंगल में अभ्यास करने जाते थे और घंटों इसे बजाने का प्रयास करते रहते थे।
लगातार अभ्यास और साधना के चलते तगाराम करीब १५ वर्ष की उम्र में अलगोजा के माहिर वादक बन गए और पूरी तरह इसी साधना में लीन हो गए। वर्ष १९८१ में स्वतंत्रता दिवस के एक कार्यक्रम में अलगोजा वादक की आवश्यकता पड़ी, जहां तगाराम को पहली बार मंच पर प्रस्तुति देने का अवसर मिला। इस मंच ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अपने अलगोजा वादन के दम पर तगाराम भील ने ३५ से अधिक देशों में प्रस्तुतियां देकर राजस्थान और भारत का नाम रोशन किया। आज उनकी वर्षों की साधना, संघर्ष और समर्पण का ही परिणाम है कि मूलसागर की मिट्टी से निकले एक साधारण लोक कलाकार को पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा जा रहा है।
तगाराम भील के पुत्र हेमराज ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि उनके पिता को पद्मश्री पुरस्कार मिलने से पूरा परिवार गौरवान्वित है। उन्होंने बताया कि उनके पिता कई देशों की यात्रा कर चुके हैं और विदेशों से भी लोग अलगोजा सीखने के लिए उनके पास आते रहते हैं।
हेमराज ने कहा कि वह खुद भी अलगोजा सीखने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि उनके बड़े भाई इस वाद्ययंत्र को अच्छे तरीके से बजा लेते हैं।
यह सम्मान न केवल तगाराम भील का, बल्कि राजस्थान की लोक कला और संस्कृति का भी गौरव है।