क्या मां से सीखी कांथा कला ने तृप्ति मुखर्जी को पद्मश्री दिलाया?

Click to start listening
क्या मां से सीखी कांथा कला ने तृप्ति मुखर्जी को पद्मश्री दिलाया?

सारांश

तृप्ति मुखर्जी ने कांथा कला के माध्यम से न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाया है। इस प्रक्रिया में उन्होंने अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजते हुए एक नई दिशा भी दी है। जानें कैसे उनकी कला ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार दिलाया।

Key Takeaways

  • कांथा कला की पारंपरिक महत्वता को समझें।
  • महिलाओं को आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाने का प्रयास।
  • तृप्ति मुखर्जी का योगदान स्थानीय हस्तशिल्प में उल्लेखनीय है।
  • पद्मश्री पुरस्कार एक महत्वपूर्ण सम्मान है।
  • कला के माध्यम से संस्कृति को सहेजना।

कोलकाता, 27 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के सूरी में रहने वाली प्रसिद्ध हस्तशिल्प कलाकार तृप्ति मुखर्जी ने कांथा सिलाई की पारंपरिक कला के माध्यम से न केवल अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है, बल्कि हजारों ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का मार्ग भी प्रशस्त किया है।

केंद्र सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किए जाने के बाद, तृप्ति मुखर्जी ने इस सफलता का श्रेय अपनी मां को दिया है। उन्होंने बताया कि कांथा कला उन्होंने अपनी मां से ही सीखी थी और इसलिए यह सम्मान उन्हें समर्पित है।

पद्मश्री पुरस्कार विजेताओं की सूची में शामिल होने के बाद, राष्ट्र प्रेस से बातचीत में तृप्ति मुखर्जी ने कहा कि उन्होंने बीरभूम जिले के लगभग हर गांव का दौरा किया है, जहाँ उन्होंने महिलाओं को नक्षी कांथा कला का प्रशिक्षण दिया है। अब तक, 20,000 से अधिक महिलाएं इस पारंपरिक कढ़ाई कला को सीख चुकी हैं और इससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन गई हैं।

तृप्ति के अनुसार, ग्रामीण महिलाओं का सीखने के प्रति उत्साह और मेहनत हमेशा उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहा है।

तृप्ति की नक्षी कांथा कृतियां ग्रामीण जीवन की जीवंत तस्वीर पेश करती हैं। उनकी कलाकृतियों में गांव की महिलाओं के संघर्ष, सपने और आकांक्षाएं स्पष्ट रूप से झलकती हैं। वर्षों से उनके इस काम को न केवल राज्य बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। पारंपरिक कला को आधुनिक पहचान दिलाने में उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है।

उनकी कला और योगदान को पहले भी कई बड़े सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2012 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था। इसके बाद, वर्ष 2017 में पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें बंगश्री सम्मान प्रदान किया। वहीं, 2018 में केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय द्वारा हस्तशिल्प के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें ‘शिल्पगुरु’ पुरस्कार से नवाजा गया। अब पद्मश्री पुरस्कार उनके सम्मानों की इस लंबी सूची में एक और बड़ी उपलब्धि के रूप में जुड़ गया है।

अपनी खुशी जाहिर करते हुए तृप्ति मुखर्जी ने कहा कि इस सम्मान को पाकर उन्हें बेहद प्रसन्नता हो रही है। बचपन से जिस कला को उन्होंने शौक के रूप में अपनाया, वही आज उनके लिए पेशा बन गई और आज उसी ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक दिलाया है।

Point of View

बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है। उनकी कला ने न केवल उन्हें पहचान दिलाई, बल्कि उनके माध्यम से हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। यह भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
NationPress
06/02/2026

Frequently Asked Questions

तृप्ति मुखर्जी ने कांथा कला कब सीखी?
तृप्ति मुखर्जी ने कांथा कला सबसे पहले अपनी मां से सीखी थी।
बीरभूम जिले में तृप्ति मुखर्जी का योगदान क्या है?
तृप्ति मुखर्जी ने बीरभूम जिले के लगभग हर गांव में महिलाओं को नक्षी कांथा कला का प्रशिक्षण दिया है।
पद्मश्री पुरस्कार कब मिला?
तृप्ति मुखर्जी को हाल ही में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
उनकी कला का क्या महत्व है?
उनकी कला ग्रामीण जीवन के संघर्ष, सपनों और आकांक्षाओं को जीवंतता प्रदान करती है।
तृप्ति मुखर्जी को अन्य कौन से पुरस्कार मिल चुके हैं?
उन्हें 2012 में राष्ट्रीय पुरस्कार, 2017 में बंगश्री सम्मान और 2018 में शिल्पगुरु पुरस्कार मिल चुका है।
Nation Press